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Tuesday, 25 October 2011

दीवाली क पहिले


दीवाली सँ पहिले
 कोदारि सँ खूनैत
 करिया माटि
 पनि द' छछारैत सानैत मिलबैत कुम्‍हार
 चाक पर बैसा के
 गांरि काटैत कुम्‍हार
 कखनो हवा बसात सँ बचबैत
 रौद मे सुखबैत कुम्‍हार
 गोइठा जारन कोयला
 सँ जरबैत कुम्‍हार
 लाल लाल दीप देखि
 मोंछ पिजाबैत कुम्‍हार
(रवि भूषण पाठक)

Monday, 24 October 2011

धनतेरस राति

बहुतो रास दूटकिया लॉटरी
अखबारक ईनामी कूपन सब
दू नम्‍मर सॅं छूटैत डिवीजन
तीनू बेर बेटिये बेटी ।
तैयो साहस करैत
घुसलउँ बजार
सोना चानी क कोन बात
टिनही लेल भेल प्रात
डोलैत करौछ छोलनी बेलना सब
जेना डरबए लेल नाच करैत छल
कठौत टुकुर टुकुर ताकैत रहए
जेना हमहीं सनेबए
उसनए क नौत दैत छल
उ फूलही डेकची
अओ बाबू आइ त' भॉगो नइ खेलियइ
ई कूकर कथी लेल सीटी मारइ छइ
अरे बाप चूल्हियो कहॉ पजारल छइ
धुर जो
ई की भेलइ हमरा
किछु ने किछु त ' खरीदनइ जरूरिए
चलू थारी खरीदल जाए
छोट छोट बच्‍चा छइ
तीन चारि खाना वला थारी
नाना विधि व्‍यंजन नइ
छप्‍पन भोग नइ
नवान्‍नो त हेतइ
एकटा मे रसदार एकटा भूजिया
एकटा मे अँचार पापर
ऑखि नइ लगबू
जीय' दिय' हमरा
जाइ छी गाम पर
आहूं जाउ ।
 (रवि भूषण पाठक )
pratipadamaithili.blogspot.com

Thursday, 20 October 2011

हम पुरहितिया


इजोत सँ अन्‍हारक अनंत यात्रा
हँ हँ पूर्णिमा से अमावस्‍या बूझू
पतरा देखैत दिन गुनैत
पतिया कटैत
सब शुभाशुभ जेना हमरे पाछॉ लागल अछि
ठीके चिन्‍हलउॅ
हम छी मिथिलाक पुरहितिया बाभन ।
सुरजो सँ पहिले शहरियो सँ पहिले
जोतुआ बड़द बहलमानो सँ पहिले
मियॉं जीक मुरगाके बॉगो सँ पहिले
सबसँ पहिले उठिके
पूज' चाहैत छी
अपन कम
दोसर के भगवान के बेशी
पाप पुण्‍य व्रत विधि
सब दोसरे लेल
मिलबो करैछ दोसरे कें
आ हम नित्‍य नित्‍य  घुमि रहल छी
कखनो पैदल कखनो साइकिल
हमरो दुनिया खूब जमल अछि
जजिमनिका क ऐ तीन गाम सँ
प्रति सॉझ हम आबइ छी
पाव भरि गहूम आसेर मकइ
किलो धान क पोटरी ल' के
संगहिसंग एक मटकूरी दही लेने
पंडिताइन खोलइ छथिन
ई पोटरी
जेना रानी खोलइ
पड़ोसी रानीक भेजल उपहार ।
वा कुबेरक कनिया जेना देखथि 
घरवला क कृतकृत्‍य ।
आ कहियो राति बारहो एक
जिन्‍न सबसँ बतियाइत 
ब्रह्मराक्षस कें चून तमाकूल दैत 
चुड़ैल सबके धकियाबैत 
पछुआबैत ब्रह्मडाकिनी के 
सरियाबैत अपन मटकूरी ।
आ वौआ बड कठिन छइ 
जजिमानी बचेनइ 
कम देबहो तैयो 
रूसनइ मना छइ 
बेशी देबहो तैयो 
प्रशंसा नइ सुनबहक 
गमि लेबहक तों सब 
सब बडा बढि़या 
खूब नीक 
चलि रहल छइ 
भगवानक माया छइ ।
रवि भूषण पाठक

Sunday, 16 October 2011

चालीसक बात

तेरह साल पहिलेक बात छइ
 ओ सब
 ओ सब बात
 आब त हमहु चालीसक लगभगाएल छी
 तोहूं जरूर चौंतीस पैंतीसक भ गेल हेबें
 कहां पूछि सकलियओ तोरा सं कोनो बात
 आब त प्रश्‍नो सब बिसरि गेलहुं
 जे यादि केने छलियओ तोरा सं पूछए लेल
 हवा क साथ दइ वला केश हमर
 किछु उडि़ गेल
 किछु पाकिके डरा रहल अछि
 हंसीक साथ निकलइ वला धवल दांतक पांति
 किछु टुटि गेल
 किछु हिल रहल अछि
 तहिना गोरनार चमरो ई
 भेल कारी बदरंग
 तू केहन भ' गेलें
 कतओ देखबओ
 त कोना चिन्‍हबओ
 ई कहनए त बिसरिये गेलियओ
 हमरा दू टा बच्‍चो अछि
 तोरा कएक टा छओ
 आ तों कत' रहैत छें
 की तूहू हमरे जँका नौकरी करैत बनरा गेलें
 आबो सुनइ छें राति के रेडियो
 आ लिखइ छें पोस्‍टकार्ड
 की तोरो कोनो पता नइ छओ
 ई निरर्थक गद्य बस तोरे लेल
 तूही बूझबीही छंदक भयानक दुनिया मे
 तुकहीन पद मे छुपल
 एकटा नीरव एकांत अर्थ
(रवि भूषण पाठक)