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Sunday, 29 July 2018

छौड़ा अजगुत कंप्‍यूटर छै

लौत उदास
परखैत  पासंग
वौआ क्षणेक्षण
 साइड बदलै छै !
कत्‍ते वाह !
आ कत्‍ते कमाल कहू
बस तीन मिनट पहिले बीचोबीच रहै
एक मिनट पहिले वाम भेलै
मिनटे पंचर जाम भेलै
दहिने छौड़ा गाम गेलै
मतलब पूरा कलाकारी बीचोबीचक
कत्ते जल्दी गुट बदलै छै !
कोना के गुटपिट ?
गुट तोड़ै छै
छौड़ा अजगुत
कंप्यूटर छै
गुरुओ संग
नोच्चा-नोच्ची
कोना-तीत्ती
सिंघीपताली
खनेखन छौड़ा
गुरु बदलै छै !

Thursday, 26 July 2018

महाकवि विद्यापति

युवाकवि विद्यापतिक पुरूषपरीक्षा
कवि सँ बेशी ओइ जुगक मांग
पुरूषार्थ आ ओइ पौरूषक प्रशंसा
ओइ दरबार आ बूढ़रसिक समै केर छन्‍द
तैयो ओइ कवि के शत्रु साओन बिढ़नी के छत्‍ता
केओ किताब चोराबै ,केओ पांड़ुलिपि पोखरि मे फेंकि दै
कतेको चेतावनी ,रस्‍तारोकी ,छीनाछोरी
विद्यापति जानैत रहथिन
कि पुरनका पोथी बिसरले सँ नवपोथीक आगमन
पुरूषपरीक्षा लिखै काल हुनकर बैठकी भरल रहै
वेद-पुराण ,व्‍याकरण ,न्‍याय-स्‍मृतिक ग्रंथ सँ
जयदेव ,वात्‍स्‍यायन आ भामहक भार सँ दाबल
पाणिनी आ पिंगलक बान्‍ह सँ पिसाइत कल्‍पैत युवाकवि
सबसँ पहिले फेंकलखिन पुराण आ स्‍मृति
तखने प्रकट भेलखिन कीर्तिलता आ कीर्तिपताका
मुदा एखनो संतोष नइ
ऐ कीर्ति के तुच्‍छ बूूझैत बढि़ गेलखिन आगू कवि विद्यापति
फेर फेंकलखिन छंद-काव्‍य आ दर्शनक शताधिक पोथी
फेकैतो काल प्रणाम करैत ओइ पोथी सभ के
महल आ बैठकी कें त्‍यागि
आबि गेलखिन जन आ जनपदक मध्‍य
जनपदक संगे-साथ चिन्‍ह' लागलखिन जनमन
तखने त' दुख‍हि जनम भेल ,दुख‍हि गमाओल
ऐ दुख के गमिते उदित भेलखिन महाकवि
महाकविक कविता राजा जनकक नइ
आरक्षित बस जनजनक लेल
जइ कविताक छाती मे धुकधुकाइत रहै मिथिलाक श्‍वास
ई अमरक‍विता तुरूकक कागज पर लिखाइ सँ बेशी अमर भ' गेलै
कोटिजनक ह्रदय मे ,रक्‍त मे ,माटि मे


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हयौ साहेब
अहां के एखनो एहनेसन लागै कि विद्यापति बाभनक कवि
आ विद्यापति कें जियेने रहलेन बाभन सब
अपनेने आ माथ पर चरहेने रहलेन बाभन सभ
हयौ महराज
विद्यापति त' भ' गेलखिन चारू लोक सँ बाहर
महराजक दरबार सँ
पंडितक चुटपांति सँ
शास्‍त्रार्थक झूठ-अखाड़ा सॅ
अहॉं नीक-हमहूं नीक सँ
मुदा महाकविक कविता जीयत रहलै
माथ पर सम्‍हरल बोझक हुंकारी सँ
काशी आ नेपालक व्‍यापारी सँ
जहिना प्रिय असोम आ बंग मे
तहिना अराकान आ अंग मे
महाकवि बरहैत गेलखिन
महफा उठेने कहारक पदचाप संग
मखान तोड़ैत मलाहक अलाप संग
महाकवि आगि भ' गेलखिन
अगहन-पूसक घूर मे
महाकवि पाथर भ' गेलखिन
दुसाधक दुख संग
महाकवि गामबदर
डोम-हलखोरक टोल-टापरि मे
अधमरू महाकवि कें आश्रय भेटलेन नारीजनक कंठ मे
दुख आ कष्‍टबोधक जांता-गीत बनि
मुदु प्रतिशोधक उक्‍खडि़-समाठ छंद मे
महादुख पर लेपैत सोहरक लेप मे
महाकवि जी गेलखिन विषम-विवाहक व्‍यंग्‍य मे
महाकवि जी गेलखिन बूढ़-छिनारक ललैठी धरबा लेल
सभ पोथी-पतरा फेकैत 
पुर्नजीवित महाकवि
बस रूकि गेलखिन मैथिलानीक लोर संग
यैह लोर शालिग्रामी ,बागमती कें भरैत
कोशी ,गंडक कें तोड़ैत
सभ साल दहबै-दहाबै छै मिथिला के



Tuesday, 10 July 2018

हेमचंद्र आ भाखा

कलिकाल सर्वज्ञ हेमचंद्र निर्णय लेलखिन
बहुत भेलै देवभाषा ,आब केवल भाखा ,केवल भाखा
देवलोक मे नइ भेलै जय-जयकार ऐ बातक
पार्वतीनंदन मुसकिएलखिन मुदा
 देवी भारती सेहो सकारैत देखलखिन धरती दिस
निर्णयक बाद तियागैैत राजपद ,राजभोग आ राजवस्‍त्र
चलि देलखिन गाम दिस एकटा विस्‍टी पहिन
आ देवदूत सभ लागि गेलाा युुक्ति मे
कि कोहुना तपस्‍याच्‍युत होथि मुनिवर
सभसँ पहिले रस्‍ता मे तीन सहस्र लहरचुट्टा
काटैत खून बहबैत ओध-बाध करैत
कि मुनिवर करौथ पुकार देवभाषा मे
एकक्षण रूकैत मुनिवर आगू बढ़ला
फेर तीन टा उल्‍लू
मुंह दूसैत हेमचंद्र कें
कि शायत ई भागतौ दिल्‍ली दरबार
भाखा बस एक्‍कर टीटकार
कनेक विचलित होइत
 रूकलखिन नइ मुनिवर
आगू तीनटा कारकौआ
रे हेमचंद्र झरकौआ
ई कोन नाटक वौआ
केहन षड्यंत्रक पौआ
फेर तीन सहस्र डाइन-जोगिन
नाच-गान ,जोग-टोम
तीन बाभन तीन डोम
संसृति-संस्‍कृतिक
करिते होम
आबें रे जगदपापी
आबें शंकरक विलोम
रूकि गेलखिन हेमचंद्र
आब नेे संस्‍कृ‍तक वैभव
ने भाखाक पराभव
आब किछु नै
तीन बरखक बाद
फेर वैह भाखा आ भाखा
बढि़ चलला हेमचंद्र
अपन गाम दिस
आब बस दस कोस
आगू संस्‍कृत पंडितक दरबार
बात-बात पर शास्‍त्रार्थ
आ विद्याक दोकानी कारोबार
त' कोन अपभ्रंश मे लिखथिन हेमचंद्र
जत्‍ते दिशा ओत्‍ते अपभ्रंश
ने कुनो आचार्य
ने कुनो व्‍याकरण
त' हेमचंद्र अकेले की सब क' लेथिन
आ देखै छियेन जे ओ की करै छथि
पंडित सभ आंखि मून‍ि यादि केलखिन
रट्टल नापल जोखल सूत्र सभ
आ पाणिनि कें भाला पर
भरत कें बरछा पर राखि
तीर पर वात्‍स्‍यायन कें बैसा
आनंदवर्द्धन कें धनुष मे समाहित करैत
प्रतीक्षा कर' लागलखिन
किछु बाजथि हेमचंद्र आब
बाजि कें त' देखथि
आ कल्‍पने मे चल' लागलै
काव्‍य आ तर्कक तीर
हेमचंद्र खूब सुस्‍ताक फेर एकटा निर्णय लेलखिन
ओना भाखा मे नइ लिखबाक शताधिक कारण छलै
आ सर्वोपरि कि लिखी त' केकरा लेल लिखी
आ भाखा कें छोड़ी त' कोन मूरखहबाक भरोसे
तें देवभाषा चलै त' चलैत रहै
मुदा भाखाक नाव जरूर चलै
जन-जन केर काठक सहारे
कविजनक लग्‍गा आ करूआरि सँ
आ भाखाक मूनेमून जयजयकार करैत
ध्‍यानस्‍थ भ' गेलखिन मुनिवर हेमचंद्र




Saturday, 2 June 2018

मायकोवस्‍कीक लेल समाधिलेख :ब्रेख्‍त

शार्क धोखा खाइतेे पड़ेलए
सिंह हारि-हारि भागलए
ऊ उड़ीस रहै
जे गिल गेलै हमरा
(जर्मन कवि ब्रेख्‍तक कविता- मायकोवस्‍कीक लेल समाधि लेख)
हिंदी अनुवादक मोहन थपलियालक कविताकोश पर अनुवाद सँ भावानुवाद

Tuesday, 29 May 2018

हमरो आभा एहि मे


नव गगन मे चमकैत नव नव सूर्यदेव
ई द्युतिमान विशाल भूखंड
हमरो आभा एहि मे

सुंदर गमकैत सुशोभित
बहुरंगी 
ई जे एत्‍ते खिलल फूल
काल्हि हमरे प्राण नहेने छलै
काल्हि हमरे स्‍वप्‍न लगेने छलै गुदगुद्दी


पाकल सोनपंखी फसिल
अइ बेर भरल खरिहान मे
जइ मे मुसकियाइत हमर नस-नस केर खून


नव गगन मे चमकैत नव नव सूर्यदेव
ई द्युतिमान विशाल भूखंड
हमरो आभा एहि मे


नागार्जुन (यात्री जी)
अनुवाद-रवि भूषण पाठक





Wednesday, 7 March 2018

फलां बाबू

फलां जी कवि बनै लेल चलि गेला एकदम उत्‍तरांत मे
ओ सागरमाथाक एकटा चेंपा ल'ए के घुरता
चिल्‍लांजी आलोचक बनबा लेल चलि गेला जत' सँ दच्छिन प्रारंभ होए छैक

आब ओ दछिनबरिया ध्रुव पर फहराबैत झंडाक फोटो ल'ए के घुरता
आ चिरंजीवी बौआ बनि गेला सबसँ गहीर संपादक
धरतीक केंद्र ढ़ुरहैत ढ़ुरहैत
आब धरतीक गुरूत्‍व पचेलाक बादे लौटता

तहिना ओ चलिते गेलखिन चलिते गेलखिन पछबारी दिशा मे
आ ओ सब किछु बेचिए क' दम लेता
आ दोस हम्‍मर रसायनक बोरा संग कूदि गेलखिन समुद्र मे
समुद्रक प्रकृति बदलिए के ओकर ओकाति बतेथिन
हुनकरो एकटा दोस राखने डिटर्जेंटक बोरा मुंह मे
ओ सोखने जाइ छथिन शब्‍द ,सपना आ बुलबुल्‍ला
तें ई पूरा दलान खाली छैक
आबू 
सबसँ सधारन वाक्‍य  आ सोलह आना आत्‍मविश्‍वासक संग

Saturday, 10 February 2018

काव्‍यमीमांसा आ मिश्रभाषा

आचार्य राजशेखर रचित 'काव्‍य मीमांसा' मे सरस्‍वती अपन काव्‍यपुत्र सँ कहैत छथिन -- शब्‍द आ अर्थ अहांक शरीर अछि ,संस्‍कृत अहांक मुख ,प्राकृत बांहि , अपभ्रंश जांघ ,पैशाची चरण आ मिश्रभाषा छाती ।(शब्‍दार्थात्‍मकमेव तव काव्‍यपुरूषस्‍य वपुरित्‍यर्थ: ।संस्‍कृतं मुखमित्‍यादिना च तत्‍तदवयसंस्‍थानं प्रदर्शितम । मिश्रमिति ।प्राकृृृृतावान्‍तरभाषामिश्रणात्‍मकमित्‍यर्थ: ।)
मुदा मैथिलीक आचार्य सभ खांटी आ शुद्धक स्‍थापना मे अमर भेल जाइत छथिन ।जीवनक बदला मे व्‍याकरण ढ़ुरहै वला आचार्यक भाषा विशिष्‍ट अर्थक सुखार सँ भरल छैक आ मानकीकरणक पताका करेह आबैत आबैत मौला जाइत छैक ।