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Thursday, 7 February 2013

यात्री 3



करियन  तरौनी बीचक पचास किलोमीटर जमीन
करेह  बागमतीक कछार मे बसल पचासो गाम  टोल
बात जे नोट करै वला अछि से नोट करब दोस
जे यात्री कुटुम नइ रहथि हमर
 ने हुनकर बेटा धिया पूता सँ कोनो दोस-महीमी हमर
मुदा जे बात बरछा सन धसै अछि हमर करेज मे ,सेहो सुनु
विद्यापतिक बाद के एहन मैथिल  कवि जे कविता के कविता बुझलकै
 के एहन कवि जे छंद  पद्य सँ कविता कें अलग केलकै
वैह यात्री वैह यात्रिए ने
 बात बस एतबे कि  जे केलकए से बात हम स्‍वीकारी
  कृतघ्‍नता कें कोन कलाकारी कही
कि बहस सरेबाजार छइ कि यात्रीक काव्‍य मे
कत्‍ते श्रम कत्‍ते रंग कत्‍ते फूल  कत्‍ते रस
 तों जत्‍ते थेथरई सँ कहैत छहक यात्री के   ?
ओतबे बल सँ हमर दिमाग नसियाइत भसियाइत छैक
कि यात्री कवि नइ द्रष्‍टा छलै
समाज साहित्‍य दिस उंगरी देखबैत.......
 उंगरी तोरो दिस ओतबे ऊठल
जत्‍ते हमरा दिस

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