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Monday, 4 February 2013

kavita

1.
"आब किछु नै लिखब"

तखन धरि आब किछु नै लिखब
जखन धरि हमर रचनामे
कोनो गरीबक वा दुखितक
दुख दूर करैकेँ क्षमता नै भऽ जाए
जखन धरि पाथर करेजसँ निकलल आखर
कोनो भिखमंगाक देहपर कपड़ा आ
पेटमे दू टा दाना(ऐँठे सही) नै दऽ सकत
तखन धरि हम नै लिखब
किन्नौँह नै लिखब
किएतँ हमरा इयाद अछि ओ कारी साँझ
जहिया देखने छलौँह
बीच बजार लूटैत नारिक इज्जत
आ फेर दोसर दिन हेंजक हेंज कवि
अपन कलमसँ शब्द उगलि कऽ
ओहि घटनापर छंद रचि रचि
नाउ कमा रहल छलाह
मुदा घटनाक बेर
कोनो कविक हाथ नै उठलै
ओकर इज्जत बचेबाक लेल
जँ एहने कवि बनि हमहूँ रहब
तँ धिक्कार अछि हमर जीवनपर
तेँ हम किछु नै लिखब
ओना करेजक भाव रूकै नै छै
अनवरत अष्टयाम जकाँ
सदिखन बहराइ छै कागतपर
सागरक ढ़ेह जकाँ दिमागक नसपर चोट करै छै
मुदा हम तखनो नै लिख सकै छी
कारण हमर देहक खून
भाफ बनि सूखि गेल अछि
भाव एहि स्वार्थी समाजकेँ देख पतनुकान देने अछि
आ कलमक आगि मिझा कऽ चिरनिद्रामे सुतल अछि
तेँ हम किछु नै लिखब
किन्नौँह नै लिखब

2.
"हँसी"

कोनो चौकक चाह दोकानपर
बूढ़बा भजारक बीच चौल
आब नै होइ छै एहन साँझ
नवका सासुरमे सारि सरहोजि संग
फोनेपर भऽ जाइ छै सबटा गप
आब नै भेटैछ पहिने सन प्रेम
आब नै गुंजैछ पहिने सन हँसी
एहन गप नै छै जे लोक आब नै हँसै यै
पहिनहितो हँसै छल ,एखनो हँसै यै
मुदा मोनहि मोन ,दोसरक नाकामीपर
एहि वातावरणसँ ठहक्का शाइत बिला गेलै
वा लागि गेलै पूर्ण सूर्यग्रहणसँ बड़का ग्रहण
इहो भऽ सकै छै जे एहि व्यस्त जीवनमे
लोक बिसरि गेल ठिठिएनाइ
आब मात्र भेटै यै ,परिवहनक हल्ला बीच कन्नारोहट
किओ टाकाक खगतासँ कानैए तँ किओ बढ़तासँ
किओ काजक अभावमे तँ किओ काजक बोझसँ कानैए
चाहे कोनो कारण किए नै होइ
मुदा मुँहसँ सिसकिए निकलै छै
हमरा सब ठाम सुनाइत अछि
शमशानक कोनो कोणपर मचल कन्नारोहट
जे पानिक स्पर्शसँ और तीव्र भँ जाइत अछि
ई कन्नारोहट चलिते रहत ,एहिना चलत
जखन धरि लोक स्वार्थ नै छोड़त
आपसी प्रेम आ सहयोगक भावना नै जनमतै
तखन धरि नै सूनि सकै छै
युवा ,बूढ़ वा कोनो जनमौटी नेनोक हँसी

अमित मिश्र

3.
"लूरि"

भगवान बड कोमल करेज बला छथि
तेँ दै छथि सबकेँ सोझ-साझ हाथ-पएर
मुदा कखनो कऽ ककरो लेल
भऽ जाइ छथि नर्मोहिया
आ गढ़ि दै छथि टेढ़-बाकुच
टाँग-हाथ वा कोनो और अंग
मिझा दै छथि आँखिक इजोत
एहि सोझ अंग बला समाजमे
बना दै छथि ओकरा मजाख
मुदा हमरा नजरिमे ओ अपंग श्रेष्ठ अछि
पएर ,हाथ ,आँखि बला सब किछु रहितो
नै कऽ सकै छथि एहन काज
नै चला सकै छथि हाथसँ तीनपहिया साइकिल
नै घुसकि सकै छथि चुत्तरपर मिलक-मिल
मात्र कऽ सकै छथि कुर्सीपर बैसल मेहनत
आइ आँखि बला मनुख ककरोसँ गप नै करै छथि
मुदा एकटा आन्हर अपन वाकपटुतासँ
हमरा अहाँक जेबीक टाका
अपना जेबीमे आनि सकै छथि
सोझ अंग बलाक गपसँ भऽ सकै छै हंगामा
मुदा सबहक करेज पघिल जाइ छै
टेढ़-बाकुच अंग बलाक गपपर
तेँ हमरा नजरिमे श्रेष्ट वएह छै
जेकरा लग छै
गपसँ मोन मोहि लेबाक लूरि ।

अमित मिश्र
4.

"नारिक रूप"

सब दिन देखैत छी
सब अखबारक पहिल पन्नापर
आइ एतऽ तँ काल्हि ओतऽ
छीन लेल गेल नारिक इज्जत
डाहि देल गेल कोमल कायाकेँ
वा चापि देल गेल घेँट कोनो निसबद रातिमे
हाट बजार सब ठाम देखैत छी
छेड़छाड़ होइत कोनो नवयौवना संग
आ ओहि नवयौवनाक राँगल चामपर
आबै छै कने लाजक वा क्रोधक लाली
सुरमासँ कारी भेल आँखि आ रंगीन पिपनीपर
खीँच जाइ छै गोस्साक चेन्ह
संगहि राँगल ठोरसँ निकलैछ मीठ तरंग
"की तोरा घरमे बहिन नै छौ?"
कहबाक मने रहै छै एक्के टा जे
हमर सम्मान कर
भऽ सकै यै ,हमरा बहिन नइ होइ
भऽ सकै यै ,हम कहियो पति बनबे नै करी
तखन नारिक ई दुनू रुपकेँ हम सम्मान नै करब
तँ की हम नारिक अपमान करब?
नै ।हम एखनो नारिक एकटा रूपकेँ मानै छी
जे रुप हमरा जीवन देलक
ओ रूप जेकर कोरामे खेलल छी
ओ रूप थिक माएक रूप
तेँ हम नारिक इज्जत कोनो पत्नी-बहिन रूपमे नै
बल्कि अपन जननीक रूपमे करब

5.
"फूसि बाजै छी"

हम फूसि बाजै छी
सदिखन फूसिये बाजै छी
मुदा तखन
जखन ककरो करेज
कोनो वेदनामे धुआँ फेकैत होइ
आ हमरा पता होइ ,जे
हमर कोनो गपसँ
दर्दक पाथर पघिल कऽ
सुखक फूल बनि जाएत
तखन हम फूसि बाजै छी
जखन हमर कनपट्टीपर
यमराजक(चोर-डकैत) बंदूक रहैत अछि
तखन हम फूसि बाजै छी
हम जानैत छी ,समयक कोनो ठेकान नै
नीक-खराप कोनो घटना कखनो घटि सकै यै
तखनो काल्हि भेँट करबाक सप्पत खाइ छी
सत्तमे तखन सदयह फूसि बाजै छी
जखन जीवन-मरणकेँ सवाल होइ
वा ककरो पेटपर पड़ल होइ
तखन हम फूसि नहियोँ बजै छी
कोनो जनसमुदाय बीच
अपन स्वार्थ पूर्तिलेल फूसि नै बाजै छी
मंचासिन देशक कर्ता-धर्ता बनल
कोनो बाबा वा नेता जकाँ ।

6.
दोषी के?

जेठक दुपहरियामे
घरसँ बाहरक काज करेबाक लेल
कोनो नेनाकेँ दै छी चाँकलेट वा टाकाक घूस
अपन काज सफल करेबाक लेल
भगवानोकेँ दै छी प्रसादक घूस
अपने कनियाँकेँ मुँह देखबाक लेल
मुँहदेखाइ नाउसँ दै छी घूस
अपन बेटीक जिनगीमे सुख भरबाक लेल
हुनक बाप दै छथि दहेज रूपी घूस
वोट बैलेंस बटेबाक लेल
नेतो जी दै छथि
दारू ,कपड़ा वा टाकाक घूस
मोटामोटी ई दुनियेँ चलै छै घूसपर
तखन ककरा पठाओल जाए जहलमे?
के छथि असली दोषी?
ई बात सत्त छै जे
खतम नै होइ छै मनुखक भूख
चाहे अन्नक हो वा टाकाक
जतेक देबै ततेक खेतै
तेँ घूस लै बाला दोषी नै छथि
हमरा नजरिमे वएह दोषी छथि
जे दै छथि ,अपन काज करेबाक लेल घूस ।
तँ की घूस लै बालाकेँ किछु नै कहब
वा मंचपर फूल-माला पहिरा पुरस्कृत करब
नै नै ,एहन नै करब
मानलौं भूख लगनाइ मनुखक वशमे नै छै
आ भोजनकेँ अपमानो करब नीक कर्म नै छै

मुदा एतबे भोजनपर अधिकार छै
जते भूख आ जरूरति छै ओकर देहक
आ जँ बेसी अन्न अपने खा
दोसरकेँ भूखल राखै छथि
तँ ओ भुक्खर मनुखो दोषी छथि
तेँ हमरा नजरिमे घूस लैयो बला दोषी छथि
जतबे सजा दै बलाकेँ भेटत
ओतबे सजा लैयो बलाकेँ भेटबाक चाही

अमित मिश्र

7.
भोथ धार

कतौ हड़ताल कतौ धरना
अपने नै दोसरोकेँ अंगना
बनबऽ चाहै छथि राज अपन
तेँ करै छथि जहिं-तहिं अनसन
कतौ कथा कतौ कविता गोष्ठी
जरबै छै कोनो पर्वक बाती
दीर्घायु करै लेल भाषा अपन
बैसार करै छथि क्षणे-क्षण
पुरस्कार ,भाषण आ नीक भोजन-साजन
नृत्य लीला आ गायन-वादन
आन भाषा-भाषी नेतासँ उद्घाटन
इएह नियम सब सम्मेलनमे पालन
जंतर-मंतर वा कोनो चौकपर जाइ छथि पसरि
दिन भरि बैसल चिकरैत सरकारसँ झगड़ि
साँझ पड़िते बिसरि जाइ छथि राजक माँग
भाषो बिसरै छथि चढ़िते लोटा भरि भाँग
फूसिये करै छथि एते हल्ला
बाजै नै जँ भाषा हुनके लल्ला
तेँ चमकै छै मात्र संघर्षक हथियार
मुदा छै एकर भोथ भेल धार ।

8. जागू

कान्हपर धेने झोरा-झपटा
सौँसे माँथ चानन-ठोप्पा
हाथ कमण्डल आरो चुट्टा
दाढ़ी लटकल कोशो जट्टा
नङ-धरङ रगरने भभूत
नेने भागै बूझि कऽ भूत
टाका-अन्न माँगैथ लऽ रामक नाम
पैदल जाथि घर घर सब गाम
एहिमे किछु छथि सत्ते भक्त
आ किछु छथि ढोंगी ससक्त
गलत काज आ अंधविश्वास
हुनक खूनमे केने छै वास
सब रोगक उपचारक दावा
एह भेषमे ई सब छथि गामक बाबा
ए .सी घर आ फूलक ओछेनपर
धुमन आगरबत्तीक महक आठो पहर
शिष्य मण्डलीमे नर कम बेसी नारी
सरकारी वा नीजी लागल पहरेदारी
ई छथि सब शहरक बाबा
हिनको छै बड पैघ पैघ दाबा
सब समस्याक हिनका लग उपचार
लाखक-लाख टाका देलापर भेटत साक्षात्कार
किओ फेकबेलनि घरसँ बाहर मूर्ति
किओ अपनेकेँ बतबै छथि अवतरित देवी
अंधविश्वासक हिनको लग हल्ला
पढ़ल जनताकेँ मूर्ख बनाबथि खुल्लम खुल्ला

जागू जागू एखनो यौ भाइ
बादमे की हएत पछताइ
दऽ दिऔ भूखलकेँ दूध-मेवा
बाँटि दिऔ गरीबमे सब टाका
नाङटकेँ पहिरा दिऔ कपड़ा
एकरे दुआसँ शान्त हएत ग्रह-नछतरा
तखने करताह भगवानो भलाइ
जागू जागू एखनो यौ भाइ

अमित मिश्र

9.
मित्र

किछु पुरना मित्र जेकर
बस इयादे टा छल बचल
बाधक गीत इस्कूलक खेल
क्षणमे झगड़ा क्षणमे मेल
किछु नीक किछु बेजाए गपशप
बाल दिनक खून करै रपरप
जेकरे संगे होइ छल साँझ-भोर
ओ चन्ना आ हम चकोर
मुदा समयक संग सब किछु बदलल
सबपर आब टाकाक रंग पोतल
सबहक मोन एना बदलि देलक
आब देखिते ओ मित्र मुँह फेर लेलक ।

अमित मिश्र

10. समयक संग

नै शेष बचल कोनो उमंग
ठमकल सन जिनगीक तरंग
कोना कऽ उड़तै मोनक पतंग
आशक डोर बीच्चेमे भेल भंग
सब ठाम राजनीतिक बड़का जंग
अपनौती भैयारी भेल अपंग
सालक साल एक्के ठाम सब प्रसंग
टूटल छै देशक समाजक विकासक अंग

मुदा सदिखन बदलै छै जीवनक रंग
बैसल रहलासँ नै जीतब कोनो जंग
छोरू सबहक चिन्ता बनबू अपन एक ढंग
अपन विकासक लेल करू अपनेकेँ तंग
रूकू नै बढ़ैत रहू सदिखन समयक संग

अमित मिश्र

10.
जीवन एहिना चलैत रहै छै

कखनो घटाउ आ कखनो जोड़ै छै
कखनो गुणा कखनो भाग करै छै
कखनो आगू कखनो पाछू घुसकै छै
जीवन एहिना सतत चलैत रहै छै

कखनो दुखक भूकंप सुनामी आबै छै
कखनो सुखक गमगम फूल बरसै छै
कखनो भीड़मे कखनो एकान्त जीबै छै
जीवन एहिना सतत चलैत रहै छै

कखनो पिछरै कखनो दौड़ै छै
कर्मक पथपर काँट-रोड़ो भेटै छै
नदी नाला सब बाधा लाँघै छै
जीवन एहिना सतत चलैत रहै छै

किछुए दिनकेँ साँस भेटै छै
जे किओ एक्को पल नै रुकै छै
घड़ीक सुइया संग जे किओ बढ़ै छै
वएह मानव एतऽ अमर रहै छै
जे बैसल समय व्यर्थ करै छै
वएह मनुख सब दिन कानै छै
एहन लोक लेल किओ नै रूकै छै
जीवन एहिना सतत चलैत रहै छै

अमित मिश्र

11. स्वस्थ गणतंत्र

बताह सन भेल मोनमे
गाम-गाम शहर-शहर बोनमे
सब सजीवसँ पुछैत रहलौँ
बिनु रुकने बुझू बनि यंत्र
नै भेटल स्वस्थ गणतंत्र

जनतासँ जनता लेल शासन
जनते बैसल चढ़ि सिंहासान
ई परिभाषा एहन जेहन पुरना बासन
आब धधकै नव परिभाषाक जारन
अमीरसँ गरीबक लेल शासन
चोर ,ठक ,धूर्त बैसल चढ़ि सिंहासन
इएह छै गणतंत्रक नवका मंत्र
नै भेटल स्वस्थ गणतंत्र

नव संविधानमे शाइद एहने लिखल
चोर बनै निर्दोष ,निर्दोष चोर बनि जाइ जहल
विश्वक सबसँ पैघ संविधान एतैकेँ रचल
किछु लोकक मुट्ठीमे बन्न भेल छटपटा रहल
हे जनता! एखनो अछि किछु समय बचल
निज अधिकारक समुचित प्रयोगपर करू पहल
उपयोगी मतसँ तोड़ि-ताड़ि दिऔ ई तंत्र
तखने भेटत एकटा स्वच्छ स्वस्थ गणतंत्र

12.
भोर भऽ रहल

जन जनकेँ आवाज दऽ रहल
पहिल अंशु नव दिवस गढ़ि रहल
ललका थारी शक्तिक संचार कऽ रहल
खगक हल्ला मजगूत नीन्न तोड़ि रहल
मंद मंद पुरबा सबकेँ प्रणाम कऽ रहल
सुमनक सुगंध मोन स्वस्थय कऽ रहल
भौँरा गुनगुन मधुर गीत सुना रहल
रंगबिरही तितली फूल संग अरिपन बना रहल
कुहेसक मटमैला कम्बल फाटि रहल
दूइभपर ओस मोती बनि हँसि रहल
बरदक घण्टी खूरक थाप अनघोल कऽ रहल
युग लग बेकार हऽर खेतिहर फाड़ि रहल
आलस छोड़ह समय बाट जोहि रहल
नैन खोलह देखह दुनियाँ भागि रहल
साँझ धरि तोरा चलैत रहैकेँ छऽ
प्रतियोगिता बड तोरा आगू बढ़ैके छऽ
कुल खानदानक नाउ रोशन करैके छऽ
तोरो चन्ना बनि नभमे चमकैके छऽ
हे युवा तोरे देशक अगुआ बनैके छऽ
अन्हार केने रीति रेवाज तोरे तोड़ैके छऽ
दुर्व्यवहार अत्याचार भ्रष्टाचार तोरे हटबैके छऽ
हे मनुज निज कर्तव्य तोरे बूझि पालन करै के छऽ
जागह जागह आगि बनि अहं आ दुष्टकेँ जड़बैके छऽ
तेँ रौद सिरहन लग ठाढ़ स्वागत कऽ रहल
उठह मनुज देखह तोरे लेल नव भोर भऽ रहल

अमित मिश्र



13


बढ़ैत चल

नजरि उठा देखें चहुँ ओर
तोरे छौ साँझ आ तोरे भोर
मानलौँ बाट बहुत कठिन छै
मुदा हिम्मत आगू सब सरल छै
सदिखन कूदैत-फानैत चल
हिम्मतसँ तूँ बढ़ैत चल

नस-नसमे ले बिजली भरि
वाधा विपदासँ लड़ि -झगड़ि
काँट-कूश जंगल-झाड़ीकेँ उखाड़ि
मेघ-खण्ड पाथरकेँ फोड़ि-फाड़ि
डेगे डेग ससरैत चल
हिम्मतसँ तूँ बढ़ैत चल

रण ई जीवन पीठ देखा नै
स्वाभिमान भर माँथ झुका नै
अपना संग दोसरोकेँ बचेने
गंजन सहि अपन मुँह सीने
तीत-मीठ सब पीबैत चल
हिम्मतसँ तूँ बढ़ैत चल

चान देखलें आब सूरज धरि जो
हिमालयक अंग-अंगपर जीतक छाप पड़ि जो
धरती फोड़ि नव उर्जाक खान निकाल
किछुए दिन शेष नै समयकेँ टाल
अपने कानि सबकेँ हँसबैत चल
हिम्मतसँ तूँ बढ़ैत चल

धरती सदिखन चलैत रहै छै
घड़ी संग-संग चन्नो नाचै छै
अपनो बढ़ दोसरोकेँ बढ़बैत
भूत ,भविष्य ,वर्तमानकेँ देखैत
दसो दिशामे पसरैत चल
हिम्मतसँ तूँ बढ़ैत चल

अमित मिश्र

2 comments:

  1. 'आब किछु नइ लिखब 'कविता नीक अछि ।

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  2. 'हँसी' कविताक प्रारंभ नीक अछि ,बीच सेहो खूब नीक ,अंत मे निष्‍कर्ष देबाक जल्‍दबाजी मे कनेक भसियाइत अछि ।

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