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Tuesday, 1 January 2013

गजल

गजल मुइलहा चाममे दरद नै होइ छै सुखक जिनगी कतौ नगद नै होइ छै लूटऽ दे इज्जतसँ शोर केलासँ की भीड़ छै बड मुदा मरद नै होइ छै आगिमे जड़ल छै देशकेँ लोक सब क्रोधकेँ खूनमे शरद नै होइ छै लाखमे एकटा होइ छै काजकेँ सगर बाछा तँ नव बरद नै होइ छै आश रहतै तँ नै हारि पेबै "अमित" दैव सदिखन तँ बेदरद नै होइ छै फाइलुन 212 चारि बेर सब पाँतिमे बहरे-मुतदारिक अमित मिश्र

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