मैथिली साहित्य आ मिथिलाक संस्कृति पर विमर्शक एकटा मंच ।प्राचीन गौरवशाली परंपराक पहचान आ नवीन प्रगतिशील मूल्यक निर्माण लेल एकटा लघु प्रयास ।
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Monday, 29 April 2013
दलाल
विहनि कथा- दलाल
जिला मुख्यालयक बाहर एकटा घौनगर गाछक छाहरिमे दू टा अधवयसु बक-झक (गपक
माध्यमसँ झगड़ा) कऽ रहल छल।एकटा दलाल छल आ दोसर आम आदमी ।आम आदमी चमकैत
बाजल," हमरा अहाँ मुर्खाधिराज बूझि लेलौं की ?अपन ठेकान नै आ हमरा कानून
पढ़बऽ आबि गेल ।
एते सूनि दलालो जोशमे आबिगेल आ काँख तऽर दाबल कागतक बण्डल पटकि आँखि
तरेरैत बाजल," तँ की हम भिखमंगा बुझाइत छी ? अपन स्वार्थसँ अहाँ आयल छी
।ई हमर कर्मस्थल अछि तें नै तँ सब गरमी झाड़ि दितौं ।
आम आदमीकें गोस्सा चढ़ले रहै आब और बढ़ि गेलै ।थरथराइत देह आ तोतराइत
आवाजमे फुँफकारलक,"सा. . ."गारिसँ शुशेभित करैत," कतबो सूट-बूट लगा ले
रहबें तऽ दलाले ।जनता आ पदाधिकारी दुनूकें ठकै बला दलाल ।तोरा तँ जेलमे
जाएबाक चाही ।
दलाल कने कननमुँह केने बाजल,"हँ, हम दलाल छी मुदाभीतर बैसल पदाधिकारीसँ
नीक छी ओ तँ बिनु मेहनत केने टाका लऽ कऽ कुर्सी आ इज्जत बेच दै छै मुदा
हम मेहनत केलाक बाद टाका लै छी आ किछु नै बेचै छी ।लोककें
चोर-डकैत-घुसखोर नीक लागै छै मुदा कर्मठ-इमानदार नै ।"
आम आदमी चुप भऽ गेल आ एकटापनसैया आ कागत दलालक हाथमे दऽ देलक ।
अमित मिश्र
तोरा बिन
हवा मे उधियाइत छलौ तोहर अवाज
लोकपैरिया पर थोपल तोहर पएर
तोरा बिन तोहर गंध
तू नइ छलही कोहबर मे
साक्षी छलै चारा,कोरो आ देवाल
सभक ठोर आंखि मे ओतबे सिनेह
थारी मे आ परसन मे ओतबे अतिरेक
मुदा पता नइ किएक
तोरा बिन सासुरक दिन
बितने नइ बितैत छलैछलै
लोकपैरिया पर थोपल तोहर पएर
तोरा बिन तोहर गंध
तू नइ छलही कोहबर मे
साक्षी छलै चारा,कोरो आ देवाल
सभक ठोर आंखि मे ओतबे सिनेह
थारी मे आ परसन मे ओतबे अतिरेक
मुदा पता नइ किएक
तोरा बिन सासुरक दिन
बितने नइ बितैत छलैछलै
किरण जीक कविता 'की गाउ?'
किरण जीक कविता 'की गाउ ?' पर एक नजरि
किरण जी क' कविता 'की गाउ' मिथिला दर्शनक मार्च-अप्रिल 2013 अंक मे प्रकाशित अछि आ कविता क' ढ़ांचा(देह) मे व्याप्त विसंगतिक कारण खोजने ने खोजाइत छैक ।
पहिल पांति-
नैना मे लहुक लेश ने छै उपमान हेतैक सरोज कोना
जागलु छै छातीक हाड़-हाड़ चकबा बनतैक उरोज कोना
कविता तुकांत छैक ,लय मिलि रहल छैक आ सरोज कोना क' संग उरोज कोना क' तुकांत एकटा चमत्कार उत्पन्न क' रहल छैक ।मुदा यदि प्रश्न केवल उपमानक छैक तखन त' कविता छोट साबित हेतै । महाकवि विद्यापतिक कविता 'माधव कत तोर करब बड़ाई' आ महाकवि सूरक कविता 'उपमा एक न नैन गही' मे प्रचलित उपमानक व्यर्थता कें एत्ते नीक जँका प्रदर्शित कएल गेल छैक कि कविताक पहिल पांतिक श्रोत कें नकारल नइ जा सकैत छैक आ दोसर पांति मे उरोज नइ बनबाक असफलता कविता कें असफल क' दैत छैक ।निश्चित रूपेण उरोजक स्थान शरीर मे शरीरवैज्ञानिक दृष्टिऍं ,सौंदर्यशास्त्रीय दृष्टिऍं आ बालजीवनक केंद्र हेबाक कारणें महत्वपूर्ण छैक ,मुदा उरोजक बाद तेसर पांति मे मनोजक अभ्यर्थना कविक उद्देश्य पर निशान लगबैत छैक ।
चारिम पांति
बच्चा बिलखै छै दूध बिना बनतै कहू सोमक घैल कोना
आब देखियौ दूधक अभाव कवि कें देखा रहल छैन ,तखन फेर तेसर दिस सोमक घैल खोजबा दिस धियान सेहो जाइत छनि ,तें पांचम पांति मे मधुश्रीक विकास कें सेहो खोजैत छथिन ।
स्पष्ट अछि जे कविता मे कवि ई देखा रहल छथिन जे मिथिला मे कथी क' अभाव अछि आ की भ' रहल अछि ,मुदा शब्दक चयन मे द्वन्द्वक निर्माण करबा मे कवि असफल भ' रहल छथि तें लहु -सरोज आ छाती-उरोजक द्वन्द्व जे कविता मे देखायल गेल अछि से कविता के कमजोर करैत छैक ।
सातम पांति
नहि शिव दधीचि ,नहि याज्ञवल्क्य ,वाचस्पति मंडन वा उदयन
निश्चित रूपेण सातम पांति मे मिथिलाक विभूति सभक चर्चा अछि आ कविता सब मे बेर-बेर इतिहास पुरूष सब कें आननै कविताक स्वाभाविक विकास कें रोकैत छैक ,मुदा मैथिलीक कवि शताधिक वर्ष सँ ऐ उपक्रम मे लागल छथि आ भरिगर नाम सँ कविता के हल्लूक करैत छथि ।प्रतीक ,व्यक्ति ,संदर्भ आ घटना यथास्थान आबै आ अनावश्यक पुनरावृत्ति सँ बचेनए कविताक लेल बहुत जरूरी ।
एकटा प्रश्न ईहो अछि कि कविता मे धर्म ,राष्ट्रीयता ,दर्शन आ राजनीति कें कत्ते आनल जाए ।राजनीति आ धर्मक रोशनाई सँ लिखनए कविता कें लोकप्रिय आ दीर्धजीवी बना सकैत छैक मुदा उत्कृष्ट आ अमर नइ ।कविता अपने काव्योपकरण सँ अमर होइत छैक ।खर आ टाटक घर हजार साल नइ चलि सकैत छैक ।हजार साल चलबाक लेल फौलादी देह आ चट्टानक सीवान चाही ।ओहुना कार्लयास्पर्स कहैत छथिन कि ईसाइयत क' भीतर ट्रेजेडी नइ लिखल जा सकैत छैक आ तहिना अरबी-फारसी विद्वान सब बेरि बेरि उद्घोषणा करैत छथिन कि ईस्लामक भीतर कविता संभव नइ छैक । आ यैह प्रश्न बहुते मैथिली प्रेमी सँ कएल जाए कि हुनकर मिथिला प्रेम कत' कत' कविताक मार्ग मे अवरोध बनैत अछि ।मैथिली आ मिथिलाक विकास अनिवार्यत: मैथिली साहित्यक विकास नइ छैक आ जे गोटा मिथिलाक महानता कें दू-दू मिनट पर टेक दैत छथिन ,ओ मैथिली कविताक रक्षा आ विकास नइ क' रहलखिन ,ओहुना कविताक रक्षाक जरूरी नइ छैक ,विकास होएबाक चाही ।
नवम पांति
भुइयां मे बैसथि विप्र जतय ओ श्वान सुतै अछि गादी पर
कवि विप्र कें नीच्चा मे बैसल देखैत कुपित छथि ,किछु किछु तुलसी जँका ,मुदा कवि तुलसीक पांच सौ साल बाद भेल छथिन आ पाठकक मिजादि सेहो बदलल अछि ,मुदा कवि अप्पन ऐ स्टेंड पर आगू नइ रहैत छथिन जखन ओ कविता मे पाखण्ड आ रूढि़वादक विरोध करैत छथिन ।स्पष्टत: कवि कें बहुत रास बात कहबा के छनि ,मुदा ओ सामग्रीक चयन आ प्रस्तुति मे हड़बड़ीक शिकार होइत छथि तें निर्दिष्ट भाव राशि एकाधिक ठाम एक-दोसरक विरोध मे अछि आ ई विरोध समयक जटिलता क' संकेतक नइ अछि ,बल्कि कवित्रुटि क' स्पष्ट परिचायक अछि ।।
किरण जी क' कविता 'की गाउ' मिथिला दर्शनक मार्च-अप्रिल 2013 अंक मे प्रकाशित अछि आ कविता क' ढ़ांचा(देह) मे व्याप्त विसंगतिक कारण खोजने ने खोजाइत छैक ।
पहिल पांति-
नैना मे लहुक लेश ने छै उपमान हेतैक सरोज कोना
जागलु छै छातीक हाड़-हाड़ चकबा बनतैक उरोज कोना
कविता तुकांत छैक ,लय मिलि रहल छैक आ सरोज कोना क' संग उरोज कोना क' तुकांत एकटा चमत्कार उत्पन्न क' रहल छैक ।मुदा यदि प्रश्न केवल उपमानक छैक तखन त' कविता छोट साबित हेतै । महाकवि विद्यापतिक कविता 'माधव कत तोर करब बड़ाई' आ महाकवि सूरक कविता 'उपमा एक न नैन गही' मे प्रचलित उपमानक व्यर्थता कें एत्ते नीक जँका प्रदर्शित कएल गेल छैक कि कविताक पहिल पांतिक श्रोत कें नकारल नइ जा सकैत छैक आ दोसर पांति मे उरोज नइ बनबाक असफलता कविता कें असफल क' दैत छैक ।निश्चित रूपेण उरोजक स्थान शरीर मे शरीरवैज्ञानिक दृष्टिऍं ,सौंदर्यशास्त्रीय दृष्टिऍं आ बालजीवनक केंद्र हेबाक कारणें महत्वपूर्ण छैक ,मुदा उरोजक बाद तेसर पांति मे मनोजक अभ्यर्थना कविक उद्देश्य पर निशान लगबैत छैक ।
चारिम पांति
बच्चा बिलखै छै दूध बिना बनतै कहू सोमक घैल कोना
आब देखियौ दूधक अभाव कवि कें देखा रहल छैन ,तखन फेर तेसर दिस सोमक घैल खोजबा दिस धियान सेहो जाइत छनि ,तें पांचम पांति मे मधुश्रीक विकास कें सेहो खोजैत छथिन ।
स्पष्ट अछि जे कविता मे कवि ई देखा रहल छथिन जे मिथिला मे कथी क' अभाव अछि आ की भ' रहल अछि ,मुदा शब्दक चयन मे द्वन्द्वक निर्माण करबा मे कवि असफल भ' रहल छथि तें लहु -सरोज आ छाती-उरोजक द्वन्द्व जे कविता मे देखायल गेल अछि से कविता के कमजोर करैत छैक ।
सातम पांति
नहि शिव दधीचि ,नहि याज्ञवल्क्य ,वाचस्पति मंडन वा उदयन
निश्चित रूपेण सातम पांति मे मिथिलाक विभूति सभक चर्चा अछि आ कविता सब मे बेर-बेर इतिहास पुरूष सब कें आननै कविताक स्वाभाविक विकास कें रोकैत छैक ,मुदा मैथिलीक कवि शताधिक वर्ष सँ ऐ उपक्रम मे लागल छथि आ भरिगर नाम सँ कविता के हल्लूक करैत छथि ।प्रतीक ,व्यक्ति ,संदर्भ आ घटना यथास्थान आबै आ अनावश्यक पुनरावृत्ति सँ बचेनए कविताक लेल बहुत जरूरी ।
एकटा प्रश्न ईहो अछि कि कविता मे धर्म ,राष्ट्रीयता ,दर्शन आ राजनीति कें कत्ते आनल जाए ।राजनीति आ धर्मक रोशनाई सँ लिखनए कविता कें लोकप्रिय आ दीर्धजीवी बना सकैत छैक मुदा उत्कृष्ट आ अमर नइ ।कविता अपने काव्योपकरण सँ अमर होइत छैक ।खर आ टाटक घर हजार साल नइ चलि सकैत छैक ।हजार साल चलबाक लेल फौलादी देह आ चट्टानक सीवान चाही ।ओहुना कार्लयास्पर्स कहैत छथिन कि ईसाइयत क' भीतर ट्रेजेडी नइ लिखल जा सकैत छैक आ तहिना अरबी-फारसी विद्वान सब बेरि बेरि उद्घोषणा करैत छथिन कि ईस्लामक भीतर कविता संभव नइ छैक । आ यैह प्रश्न बहुते मैथिली प्रेमी सँ कएल जाए कि हुनकर मिथिला प्रेम कत' कत' कविताक मार्ग मे अवरोध बनैत अछि ।मैथिली आ मिथिलाक विकास अनिवार्यत: मैथिली साहित्यक विकास नइ छैक आ जे गोटा मिथिलाक महानता कें दू-दू मिनट पर टेक दैत छथिन ,ओ मैथिली कविताक रक्षा आ विकास नइ क' रहलखिन ,ओहुना कविताक रक्षाक जरूरी नइ छैक ,विकास होएबाक चाही ।
नवम पांति
भुइयां मे बैसथि विप्र जतय ओ श्वान सुतै अछि गादी पर
कवि विप्र कें नीच्चा मे बैसल देखैत कुपित छथि ,किछु किछु तुलसी जँका ,मुदा कवि तुलसीक पांच सौ साल बाद भेल छथिन आ पाठकक मिजादि सेहो बदलल अछि ,मुदा कवि अप्पन ऐ स्टेंड पर आगू नइ रहैत छथिन जखन ओ कविता मे पाखण्ड आ रूढि़वादक विरोध करैत छथिन ।स्पष्टत: कवि कें बहुत रास बात कहबा के छनि ,मुदा ओ सामग्रीक चयन आ प्रस्तुति मे हड़बड़ीक शिकार होइत छथि तें निर्दिष्ट भाव राशि एकाधिक ठाम एक-दोसरक विरोध मे अछि आ ई विरोध समयक जटिलता क' संकेतक नइ अछि ,बल्कि कवित्रुटि क' स्पष्ट परिचायक अछि ।।
किरण जीक कविता 'की गाउ?'
किरण जीक कविता 'की गाउ ?' पर एक नजरि
किरण जी क' कविता 'की गाउ' मिथिला दर्शनक मार्च-अप्रिल 2013 अंक मे प्रकाशित अछि आ कविता क' ढ़ांचा(देह) मे व्याप्त विसंगतिक कारण खोजने ने खोजाइत छैक ।
पहिल पांति-
नैना मे लहुक लेश ने छै उपमान हेतैक सरोज कोना
जागलु छै छातीक हाड़-हाड़ चकबा बनतैक उरोज कोना
कविता तुकांत छैक ,लय मिलि रहल छैक आ सरोज कोना क' संग उरोज कोना क' तुकांत एकटा चमत्कार उत्पन्न क' रहल छैक ।मुदा यदि प्रश्न केवल उपमानक छैक तखन त' कविता छोट साबित हेतै । महाकवि विद्यापतिक कविता 'माधव कत तोर करब बड़ाई' आ महाकवि सूरक कविता 'उपमा एक न नैन गही' मे प्रचलित उपमानक व्यर्थता कें एत्ते नीक जँका प्रदर्शित कएल गेल छैक कि कविताक पहिल पांतिक श्रोत कें नकारल नइ जा सकैत छैक आ दोसर पांति मे उरोज नइ बनबाक असफलता कविता कें असफल क' दैत छैक ।निश्चित रूपेण उरोजक स्थान शरीर मे शरीरवैज्ञानिक दृष्टिऍं ,सौंदर्यशास्त्रीय दृष्टिऍं आ बालजीवनक केंद्र हेबाक कारणें महत्वपूर्ण छैक ,मुदा उरोजक बाद तेसर पांति मे मनोजक अभ्यर्थना कविक उद्देश्य पर निशान लगबैत छैक ।
चारिम पांति
बच्चा बिलखै छै दूध बिना बनतै कहू सोमक घैल कोना
आब देखियौ दूधक अभाव कवि कें देखा रहल छैन ,तखन फेर तेसर दिस सोमक घैल खोजबा दिस धियान सेहो जाइत छनि ,तें पांचम पांति मे मधुश्रीक विकास कें सेहो खोजैत छथिन ।
स्पष्ट अछि जे कविता मे कवि ई देखा रहल छथिन जे मिथिला मे कथी क' अभाव अछि आ की भ' रहल अछि ,मुदा शब्दक चयन मे द्वन्द्वक निर्माण करबा मे कवि असफल भ' रहल छथि तें लहु -सरोज आ छाती-उरोजक द्वन्द्व जे कविता मे देखायल गेल अछि से कविता के कमजोर करैत छैक ।
सातम पांति
नहि शिव दधीचि ,नहि याज्ञवल्क्य ,वाचस्पति मंडन वा उदयन
निश्चित रूपेण सातम पांति मे मिथिलाक विभूति सभक चर्चा अछि आ कविता सब मे बेर-बेर इतिहास पुरूष सब कें आननै कविताक स्वाभाविक विकास कें रोकैत छैक ,मुदा मैथिलीक कवि शताधिक वर्ष सँ ऐ उपक्रम मे लागल छथि आ भरिगर नाम सँ कविता के हल्लूक करैत छथि ।प्रतीक ,व्यक्ति ,संदर्भ आ घटना यथास्थान आबै आ अनावश्यक पुनरावृत्ति सँ बचेनए कविताक लेल बहुत जरूरी ।
एकटा प्रश्न ईहो अछि कि कविता मे धर्म ,राष्ट्रीयता ,दर्शन आ राजनीति कें कत्ते आनल जाए ।राजनीति आ धर्मक रोशनाई सँ लिखनए कविता कें लोकप्रिय आ दीर्धजीवी बना सकैत छैक मुदा उत्कृष्ट आ अमर नइ ।कविता अपने काव्योपकरण सँ अमर होइत छैक ।खर आ टाटक घर हजार साल नइ चलि सकैत छैक ।हजार साल चलबाक लेल फौलादी देह आ चट्टानक सीवान चाही ।ओहुना कार्लयास्पर्स कहैत छथिन कि ईसाइयत क' भीतर ट्रेजेडी नइ लिखल जा सकैत छैक आ तहिना अरबी-फारसी विद्वान सब बेरि बेरि उद्घोषणा करैत छथिन कि ईस्लामक भीतर कविता संभव नइ छैक । आ यैह प्रश्न बहुते मैथिली प्रेमी सँ कएल जाए कि हुनकर मिथिला प्रेम कत' कत' कविताक मार्ग मे अवरोध बनैत अछि ।मैथिली आ मिथिलाक विकास अनिवार्यत: मैथिली साहित्यक विकास नइ छैक आ जे गोटा मिथिलाक महानता कें दू-दू मिनट पर टेक दैत छथिन ,ओ मैथिली कविताक रक्षा आ विकास नइ क' रहलखिन ,ओहुना कविताक रक्षाक जरूरी नइ छैक ,विकास होएबाक चाही ।
नवम पांति
भुइयां मे बैसथि विप्र जतय ओ श्वान सुतै अछि गादी पर
कवि विप्र कें नीच्चा मे बैसल देखैत कुपित छथि ,किछु किछु तुलसी जँका ,मुदा कवि तुलसीक पांच सौ साल बाद भेल छथिन आ पाठकक मिजादि सेहो बदलल अछि ,मुदा कवि अप्पन ऐ स्टेंड पर आगू नइ रहैत छथिन जखन ओ कविता मे पाखण्ड आ रूढि़वादक विरोध करैत छथिन ।स्पष्टत: कवि कें बहुत रास बात कहबा के छनि ,मुदा ओ सामग्रीक चयन आ प्रस्तुति मे हड़बड़ीक शिकार होइत छथि तें निर्दिष्ट भाव राशि एकाधिक ठाम एक-दोसरक विरोध मे अछि आ ई विरोध समयक जटिलता क' संकेतक नइ अछि ,बल्कि कवित्रुटि क' स्पष्ट परिचायक अछि ।।
किरण जी क' कविता 'की गाउ' मिथिला दर्शनक मार्च-अप्रिल 2013 अंक मे प्रकाशित अछि आ कविता क' ढ़ांचा(देह) मे व्याप्त विसंगतिक कारण खोजने ने खोजाइत छैक ।
पहिल पांति-
नैना मे लहुक लेश ने छै उपमान हेतैक सरोज कोना
जागलु छै छातीक हाड़-हाड़ चकबा बनतैक उरोज कोना
कविता तुकांत छैक ,लय मिलि रहल छैक आ सरोज कोना क' संग उरोज कोना क' तुकांत एकटा चमत्कार उत्पन्न क' रहल छैक ।मुदा यदि प्रश्न केवल उपमानक छैक तखन त' कविता छोट साबित हेतै । महाकवि विद्यापतिक कविता 'माधव कत तोर करब बड़ाई' आ महाकवि सूरक कविता 'उपमा एक न नैन गही' मे प्रचलित उपमानक व्यर्थता कें एत्ते नीक जँका प्रदर्शित कएल गेल छैक कि कविताक पहिल पांतिक श्रोत कें नकारल नइ जा सकैत छैक आ दोसर पांति मे उरोज नइ बनबाक असफलता कविता कें असफल क' दैत छैक ।निश्चित रूपेण उरोजक स्थान शरीर मे शरीरवैज्ञानिक दृष्टिऍं ,सौंदर्यशास्त्रीय दृष्टिऍं आ बालजीवनक केंद्र हेबाक कारणें महत्वपूर्ण छैक ,मुदा उरोजक बाद तेसर पांति मे मनोजक अभ्यर्थना कविक उद्देश्य पर निशान लगबैत छैक ।
चारिम पांति
बच्चा बिलखै छै दूध बिना बनतै कहू सोमक घैल कोना
आब देखियौ दूधक अभाव कवि कें देखा रहल छैन ,तखन फेर तेसर दिस सोमक घैल खोजबा दिस धियान सेहो जाइत छनि ,तें पांचम पांति मे मधुश्रीक विकास कें सेहो खोजैत छथिन ।
स्पष्ट अछि जे कविता मे कवि ई देखा रहल छथिन जे मिथिला मे कथी क' अभाव अछि आ की भ' रहल अछि ,मुदा शब्दक चयन मे द्वन्द्वक निर्माण करबा मे कवि असफल भ' रहल छथि तें लहु -सरोज आ छाती-उरोजक द्वन्द्व जे कविता मे देखायल गेल अछि से कविता के कमजोर करैत छैक ।
सातम पांति
नहि शिव दधीचि ,नहि याज्ञवल्क्य ,वाचस्पति मंडन वा उदयन
निश्चित रूपेण सातम पांति मे मिथिलाक विभूति सभक चर्चा अछि आ कविता सब मे बेर-बेर इतिहास पुरूष सब कें आननै कविताक स्वाभाविक विकास कें रोकैत छैक ,मुदा मैथिलीक कवि शताधिक वर्ष सँ ऐ उपक्रम मे लागल छथि आ भरिगर नाम सँ कविता के हल्लूक करैत छथि ।प्रतीक ,व्यक्ति ,संदर्भ आ घटना यथास्थान आबै आ अनावश्यक पुनरावृत्ति सँ बचेनए कविताक लेल बहुत जरूरी ।
एकटा प्रश्न ईहो अछि कि कविता मे धर्म ,राष्ट्रीयता ,दर्शन आ राजनीति कें कत्ते आनल जाए ।राजनीति आ धर्मक रोशनाई सँ लिखनए कविता कें लोकप्रिय आ दीर्धजीवी बना सकैत छैक मुदा उत्कृष्ट आ अमर नइ ।कविता अपने काव्योपकरण सँ अमर होइत छैक ।खर आ टाटक घर हजार साल नइ चलि सकैत छैक ।हजार साल चलबाक लेल फौलादी देह आ चट्टानक सीवान चाही ।ओहुना कार्लयास्पर्स कहैत छथिन कि ईसाइयत क' भीतर ट्रेजेडी नइ लिखल जा सकैत छैक आ तहिना अरबी-फारसी विद्वान सब बेरि बेरि उद्घोषणा करैत छथिन कि ईस्लामक भीतर कविता संभव नइ छैक । आ यैह प्रश्न बहुते मैथिली प्रेमी सँ कएल जाए कि हुनकर मिथिला प्रेम कत' कत' कविताक मार्ग मे अवरोध बनैत अछि ।मैथिली आ मिथिलाक विकास अनिवार्यत: मैथिली साहित्यक विकास नइ छैक आ जे गोटा मिथिलाक महानता कें दू-दू मिनट पर टेक दैत छथिन ,ओ मैथिली कविताक रक्षा आ विकास नइ क' रहलखिन ,ओहुना कविताक रक्षाक जरूरी नइ छैक ,विकास होएबाक चाही ।
नवम पांति
भुइयां मे बैसथि विप्र जतय ओ श्वान सुतै अछि गादी पर
कवि विप्र कें नीच्चा मे बैसल देखैत कुपित छथि ,किछु किछु तुलसी जँका ,मुदा कवि तुलसीक पांच सौ साल बाद भेल छथिन आ पाठकक मिजादि सेहो बदलल अछि ,मुदा कवि अप्पन ऐ स्टेंड पर आगू नइ रहैत छथिन जखन ओ कविता मे पाखण्ड आ रूढि़वादक विरोध करैत छथिन ।स्पष्टत: कवि कें बहुत रास बात कहबा के छनि ,मुदा ओ सामग्रीक चयन आ प्रस्तुति मे हड़बड़ीक शिकार होइत छथि तें निर्दिष्ट भाव राशि एकाधिक ठाम एक-दोसरक विरोध मे अछि आ ई विरोध समयक जटिलता क' संकेतक नइ अछि ,बल्कि कवित्रुटि क' स्पष्ट परिचायक अछि ।।
ददरा समै क'
समै क' मारि
ददरा समै क' उखड़ल
धरती क' पीठ,करेज आ दिमाग पर
कोनो लोशन क्रीम काज नइ करए
तें आब प्रसन्न हों तखने जखन खूब प्रसन्न हो
आ कान तखने जखन भुभुआइ कें मोन होए
आब हमरे देख ने
गाम हम कहिया जाइत छियै
जहिया कोनो बेटीक बियाह ,दुरागमन
या फेर कोनो पुरनिया क' लहास बजाबै हमरा
ददरा समै क' उखड़ल
धरती क' पीठ,करेज आ दिमाग पर
कोनो लोशन क्रीम काज नइ करए
तें आब प्रसन्न हों तखने जखन खूब प्रसन्न हो
आ कान तखने जखन भुभुआइ कें मोन होए
आब हमरे देख ने
गाम हम कहिया जाइत छियै
जहिया कोनो बेटीक बियाह ,दुरागमन
या फेर कोनो पुरनिया क' लहास बजाबै हमरा
ददरा समै क'
समै क' मारि
ददरा समै क' उखड़ल
धरती क' पीठ,करेज आ दिमाग पर
कोनो लोशन क्रीम काज नइ करए
तें आब प्रसन्न हों तखने जखन खूब प्रसन्न हो
आ कान तखने जखन भुभुआइ कें मोन होए
आब हमरे देख ने
गाम हम कहिया जाइत छियै
जहिया कोनो बेटीक बियाह ,दुरागमन
या फेर कोनो पुरनिया क' लहास बजाबै हमरा
ददरा समै क' उखड़ल
धरती क' पीठ,करेज आ दिमाग पर
कोनो लोशन क्रीम काज नइ करए
तें आब प्रसन्न हों तखने जखन खूब प्रसन्न हो
आ कान तखने जखन भुभुआइ कें मोन होए
आब हमरे देख ने
गाम हम कहिया जाइत छियै
जहिया कोनो बेटीक बियाह ,दुरागमन
या फेर कोनो पुरनिया क' लहास बजाबै हमरा
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