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Saturday, 24 May 2014


Sunday, 4 May 2014

गजल- गाममे साँझ नै पड़ल

2.41
सुनहट फेर सगरो गाममे साँझ नै पड़ल
शाइत ताग नेहक टूटि कऽ स्वर्ग धरि चलल

मूरत माँटि सन बनि गेल माँउसक गरम तन
ने किछु फूटि रहल स्वर, ने स्वर सुनि रहल

चुप्पी लाधि बैसल अछि विपिनमे अवोध पशु
कोनो जालमे हिरणक सकल कुटुम अछि फसल

चमचम चीज जे बेसी पलटि दैछ किरणकेँ
कनिञे चमक कम राखू तँ जिनगी बनत सरल

ममता देब कतबो ढारि फइदा कहाँ "अमित"
डिबिया काल्हि ने परसू मिझा रहत, अछि बुझल

2221-2221-2212-12
अमित मिश्र

Thursday, 1 May 2014

(दीपाली)

ऐ अंगनाक पहिल बेटी शकंतला छलै बियाह भेलै एकटा कमासुत सँ ।जेहने देखै मे सुंदर तेहने नमछड़ ।एकदम गांठल शरीर ,पचीस हजार रूपया तिलक सेहो लागल छलै ।घ'रवला कनियां कें नेने पैंजाब चलि गेलै ।ओइ ठाम दुष्‍यंत राति के पहरेदारी करै आ दिन के रिक्‍शा चलबै ।साल मे एक बेर गाम सेहो आबै .....मुदा गाम मे रहै की ,ने गाम मे ने सासुर मे ।एहिना होइत रहै कि अचानक गाम मे हल्‍ला भेलै जे पाहुन जालंधर मे एक कट्ठा जमीन खरीद लेलखिन........साल दूसाल बाद जे पाहुन एलखिन त' चरबी चरहैत रहेन ,आंखि सेहो मोटाइत रहेन आ शकुंतलाक मैथिली मे सेहो गोटेक पंजाबी शब्‍द ,किछु कहाओत सेहो पंजाबी घूसि गेल छलै ।आब लोक सब कहै छलै कि ई सब आब थोड़े गाम एतै ,आब जत' रहतै अपन गाम के एहने लटैत-बूरैत जियेने रहतै ।..........अपन एकमात्र सारिक बियाह मे पाहुन गाम आयल छथिन आ पेट डेढ़ हाथ बरहल छेन ,सूतै छथिन त' नाक-मुंह सँ अवाज होइ छैक ,गाम मे लोक सब के अजगुत जँका लागै ,मुदा शकुंतला लेल धैन सन ,ओ जालंधरो मे खूब मोन सँ रहैत अछि आ............
(दीपाली)

Tuesday, 29 April 2014

फूसिएक दुख फूसिए उल्‍लास
कोन झूठे जितब' रामविलास
नवकनियां अनचोके मे मसोमात भ' गेलै आ ई की कहि देलियै मसोमातो केओ दिन गुनाके होइ छैक ।आ कनियां एखन काननै की ढ़ंग सँ हँसनैओ नइ सीखने छलखिन ।काननै की सधारन बात छैक ,पहिले बूझियौ त' की भेल आ एखन दसो बरखक त' नइ रहै रूपाली ।ओकरा की पता छलै जे की भेलै आ की नइ भेलै ओ बस अवाके रहै ।दोसर के कानैत देखै त' कनेक कानै आ फेर चुप भ' जाए ।एत्‍ते लोक के आंगन मे देखि के कखनो घर जाए कखनो आंगन ।ईहो पता नइ रहै कि कानियै त'कत्‍ते जोर सँ कानियै ।तावते तीनू भाई दनादन पहुंचलै आ मैझला भाय डेनियाबैत कनियां के घर ल' आनलकै ।
'हगै ई काननै -पीटनै बंद कर ।आब भरि जिनगी कानैए के छओ ,पहिले ई बाज जे जमीनक कागज कत्‍त' छओ ।रूपाली अपन लोर पोछैत चाभीक गुच्‍छा फेक देलकै ।ओमहर मरैक हो-हल्‍ला आ मैझला जल्‍दी-जल्‍दी सब चाभी के टोहियेनए शुरू केलकै ।एगो चाभी लागलै आ मैझला खटाक सँ केवार खोललकै ,निचलका खाना मे कागज आ फाईल सब रहै ।एखन समै नइ छलै कि कागजक पोटरी सब मे खोजल जाए जमीनक कागज ।तें मैंझला सब कागज के एकटा झोरा मे राखैत आ झोरा के कसियाठि के पकड़ैत पछुलका घर बाटे साइकिल ल' पड़ा गेला ।
(रूपाली)
ई दसभैय्या क' आंगन छलै ,ओना त' तीनू खूंट मिलाके एगारह टा भाय रहथिन ,तैयो दसभैय्या नाम बेशी लोकप्रिय रहै ।नमहर टा आंगन आ तीन दिस सँ रस्‍ता ।राति के पूबरिया गेट पर चचरी वला फाटक लागि जाए ,पच्छिम दिस वला आ उत्‍तरवरिया गेट खुलल रहै ।उत्‍तरवरिया गेट सँ ज'र-जनाना सब दुरूखा बाटे राति-बिराति दिसा मैदान करबा लेल निकलै छलै आ पछबरिया गेट सँ राति के औरत आ पुरूख सभक आवाजाही भरि राति चलैत रहै ।राति के लगभग सब पुरूख दलाने पर सूतैत छलखिन या कनि कालक लेल अंगना आबैत र‍हथिन ।ई कनी काल बड़का रहस्‍य रहै बच्‍चा सभक लेल ,पुरूखक लेल पता नइ की आ जनाना सभक लेल एकटा जोरदार ठहक्‍का ।राति के दुआरि ,अंगना आ दलान चौकी आ खाट सँ भरल रहै ।दलान पर पुरूख पात्र आ अांगन मे जनाना सब ।एकदम लाईन सँ सजाओल खाट सब आ समै-समै पर उठैत औरत आ मर्द सब ,अपना-अपना घर मे घूसैत ।'किछु कालक' रहस्‍य अपन चेहरा पर सँ परदा हटबैत छलै किछु गोटाक वास्‍ते ,आनक लेल ई रहस्‍य बनल रहै ,शनै:शनै: रहस्‍य कम लोकप्रिय ,कम उत्‍तेजक बनैत गेलै............
(रूपाली)
अपन नाम मे कविराज या कविवर या कवि कोकिल लगेनए एकैसम सदीक साहित्यिक व्‍यवहार नइ छैक ,कविवर चेतू ।एकैसम सदी अपन नाम मे श्री लगेनहार सबके एकटा खास केटेगरी मे राखै छैक ,चेतू कवि जी......