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Sunday, 29 April 2012

दहेज मुक्‍त मिथिला दिसि एक डेग



 दिल्‍लीक एकटा प्रतिष्ठित चिकित्‍सा महाविद्यालय सँ एम बी बी एस पास केला क' बाद दिल्‍लीए स्थित एकटा महाविद्यालय मे एम0एस0 करै वला बालकक लेल एकटा सुकन्‍या चाही ।बालकक माता पिता समस्‍तीपुर स्थित अपन गाम मे रहए छथि आ हुनकर एकमात्र शर्त इएह छनि कि कनियां सेहो एम बी बी एस पास होथि वा एम बी बी एस मे पढ़ाई लिखाई करैत होथि वा कोनो मान्‍य संस्‍था सँ चिकित्‍से मे स्‍नातकोत्‍तर मे अध्‍ययनरत ।शांडिल्‍य गोत्री बालकक मूल दिघबै शकरपुर अछि ।गुण ,सौंदर्य आ संस्‍कारक लिस्‍ट हमरा लग मे नइ अछि ,हम त' केवल समदिया छी   ।ओना सर्वांग सुन्‍दरी   आ सर्वगुणक स्‍थान पर एक-दू कमो सही ।सुकन्‍या मेडिकल मे स्‍नातक वा परास्‍नातक करैत होथि तखन rabib2010@gmail.com  पर मेल करू ,या 09208490261 पर फोन करू ।हम बहुत जल्दियाएल नइ छी त' सुस्‍ताएलो नइ छी ।अहांक फोन वा मेलक प्रतीक्षा मे.........

Saturday, 28 April 2012

मनिको दाय


अप्‍पन मुंह सँ अप्‍पन बड़ाय
देखियौ देखियौ मनिको दाय
केश कहथि नागिन सन रंग गोलाय
हाय हाय हाय हाय मनिको दाय
सूस्‍ज डरै तेजी सँ पवनो हहाय
बाप रै बाप रै मनिको दाय
हुनकर की बाजब अछि
हुनकर की लिखल अछि
भक्‍क चकित विद्यापति
उगनो लजाय
कत' गेलौं कत' गेलौं मनिको दाय

Sunday, 22 April 2012

गजल


अहाँ के देखब कोना आब हम, अछि हमर भाग जडल
अहाँ सॉ भेटव कोना आब हम, अछि हमर भाग घटल

सँगे चलबै जीवन भरि बचन इ, जे अहाँ तोडि देलिएै
समेटब कहू कोना आब हम, स्वप्न हमर भाफ बनल

अहाँ लेल खेल छल किछु दिन के, की कोनो मजबूरी छल
सूनलौं ने किया किछु हमर,  मोने मे हमर बात रहल

बन्द अछि मुट्ठी मे खुसी  हमर, इ केहन भरम मे छलौं
सुखल बालु  जकाँ जे ससरल, खाली हमर हाथ रहल

फटैत छाती ल देखैत रहलौं, घुरि कs  अहाँ तकलौं कहाँ
देह के राखू   कतेक दिन हम, देखू हमर जान चलल

राति जे छत पर छलौं देर तक, कारी असमान तकैत
जेना बादल हम छलौं  ठहरल,  ओ हमर चान चलल

जागल छी बहुत दिन सॉ आब, सुतितौं हम चिर निद्रा मे
निन्द आबै कहाँ कहियो जेना, आँखि मे हमर काँट गडल

गजल- भास्कर झा

बड मनभावन नयनक शोभा, काया श्याम वर्ण उत्किर्ण
सहसमुखी सौन्दर्यक अक्ष छनि, वक्ष समक्ष प्रेम उतीर्ण ।

पैघ केशक कलि फ़ूटित बनिकए खिलि प्रेमक किसलय
नख सिख दहक महक विराजत , हॄदय होयत विदिर्ण ।

मुसिक मुसिक मन उपवन विचरय सुन्दर सब नर- नारी
प्रेमालय केर छात्र गिरि कए भय जायत बहुधा अनुतीर्ण ।

प्रेम पथिक पथ जीवन बिसराए , पटकैत सदिखन माथ
बनि कवि आब सर्वत्र बौराए, दूषित देह लागै जीर्ण शीर्ण ।

-    भास्कर झा 31/01/2012

Saturday, 21 April 2012

गजल- भास्कर झा

धक सं लागल चोट, करेजा हमर तोड़ि देलऊं
एहन भेलऊं अहां कठोर कि हमरा छोड़ि देलऊं ।

दिन हो चाहे राइत अहांके हम ईयाद छलहुं
एहन अहांके कि भ गेल कि हमरा छोड़ि देलहुं ।

सदिखन छलहुं हमर पास संग आब छोड़ि देलहुं
हम देखितॆ रहलऊं बाट अहां मुख मोड़ि लेलहुं ।

टूटल हमर पूर्ण विश्वास, दूख संग जोड़ि गेलहुं
हमरा सं कि गलती भेल कि हमरा छोड़ि गेलहुं ।

गजल- भास्कर झा

थाकल, हारल, झमारल जिनगी
बिधनाक चक्र सं फ़ारल जिनगी।

लड़ैत, मरैत, कटि रहल जिनगी
फ़ेकल, फ़ाकल, ससारल जिनगी ।

दुर्जन, सज्जन, निर्जन जिनगी
दुख - हर्खक खखारल जिनगी ।

नीज नेक कर्म सं भरल जिनगी
पर कुचक्र सं अहि मारल जिनगी।

छिड़ियाईत मैथिल- भास्कर झा



विद्वताक भ रहल लड़ाई में
विद्वजन धअ लेने छथि
अपन सुरक्षाक सब कोन
सम्मुख आब स कतरायल
डरक मारि सं घबरायल !

कवित्वक भाव विहीन
लेखनक टूटल तीक्ष्ण धार
महत्वाकांक्षाक परस्पर वैमनस्य
साहित्यक सज्जा पड़ल निष्प्राण !

सांस्कृतिक संध्याक पटाक्षेप
एक दोसर पर मात्र आक्षेप
व्यथित भेल अछि मॉन
करुण भाव सं दग्ध !

महामिथिलाक महाभारत
रमकैत पाण्डव ,कौरव, द्रोण
कॄष्णक शांति केर शीक्षा
भेल अशान्त आ क्लान्त।

मां मैथिलीक आंखि सं
झड़ि झड़ि गिरैत नोर
देखिकय पुत्रक परस्पर विद्रोह
कहिया होयत काल्ररात्रिक भोर !