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Wednesday, 28 March 2012

काकी आ भैया

जखन काकीक छोटका बेटा विनोद बाबा के डांटइ ,तखन काकी के बड हँसी लागेन ।डांटइ क मूल वाक्‍य रहइ 'बूढ़बा भोरे भोर राम राम गेनइ शुरू क' दैत छइ ,सूत नइ दैत अछि ,केवल गिलनइ जानैत अछि ,हरदम पादैत रहैत अछि ,घर मे नइ रह' देत ,आदि ,आदि ।'जखन विनोदक कनिया एलइ आ बी0ए0 क परीक्षा क' तैयारी शुरू केलकइ ,तखन यदि कहियो काकी भनसाघर भेजभिन त' विनोद लड़बा क' लेल तैयार भ' जाइ ।

'गे माए तू जे एकरा भनसिया बनबै छहीं ,से तोरा पता छओ
ई कोन घर से आइल छैक ,एकर बी0ए0 क परीक्षा छैक आ तू भात दालि के फेर मे पड़ल छही ,एखन तोहर उमेर कोनो बैसइ वला छओ' ,आदि ,आदि ।

आब काकी बूझइ छथिन्‍ह जे विनोदबा क बातचित ठीक नइ ।दुआरिये दुआरिए परचारैत काना फूसी करैत दिन बीत रहल छन्हि ,मुदा काल केकरा मुटठी मे एलइ ,जे अहांक मुट्ठी मे आएत ?

होली आ गारि

होली जत्‍ते प्राचीन पर्व अछि ,तइ सँ कम प्राचीन 'गारि' नइ ,ओना दूनू दुइए अक्षरक मुदा अतीव आकर्षण सँ युक्‍त ।हिरणकश्‍यप बला कथा त' अत्‍यंत प्राचीन अछिए ,मुदा प्राचीन साहित्‍य मे गारि सेहो अपन बहुरंगी उपस्थिति क' साथ अछि ।ऋग्‍वैदिक साहित्‍य मे होली नइ अछि ,मुदा गारि अछि ।देवता लोकनि पृथक संस्‍कार सँ युक्‍त व्‍यक्ति के 'असुर' कहने छथिन्‍ह ।ओना ओइ ठाम असुर शब्‍द पूरा पूरा गारि नइ बनल छलइ ।ओइ समयक गारि शहरी सभ्‍यता आ कृषिक समाजक विशेषता मे रहए ।वैदिक लोकनि साहित्‍यक तमाम विशेषता के धारण करितहु तत्‍कालीन विकसित सभ्‍यता कें स्‍वीकार नइ क' सकलनि आ हड़प्‍पा वासीक घर ,किला आ नहर के वितृष्‍णा सँ देखलाह ।मतलब गारि सेहो विकसित होइत छैक ।ओइ समयक अतिथि लोकनि के आदर पूर्वक गौमांस देल जाइत छल ,मुदा आइ यदि ककरो देल जाए त' हुनकर धर्मभ्रष्‍ट हेतेन आ संबंधक समाप्ति अलगे ।वैदिक काल मे विंध्‍याचल सँ दक्षिण रहए वला लोक विशेष सम्‍मानक अधिकारी नइ छलाह ,मतलब ई जे तथाकथित सभ्‍यता गांगेय प्रदेश मात्रे मे मानल जाइत छलै ,आ आन लोक सब असभ्‍य मानल जाइत छलाह ।

निशांत झा


निशांत झा

Tuesday, 27 March 2012

प्रतिज्ञा

प्रतिज्ञा बहुत रासक
सभक अपन अपन रंग
अपन अपन खून
अपन आगि पानि
प्रतिज्ञा केवल उपनेन दिनक कनफूंकाइए नइ
ईसकुल गाम समाज यात्रा क' प्रत्‍येक शिक्षा के निमित्‍त
प्रतिज्ञा केवल पितृऋण मे घोघचल कोना
सभक ऋण नितदिन दोबर तेबर होइत
गाम पोखरि किताब भाषा आ ब्रहमाण्‍ड मे पसरल
कखनो कखनो सप्‍तपदी क' प्रतिज्ञा हावी होइत
सभ ऋण सभ प्रतिज्ञा सभ सपना पर
छेटनगर दिमागक सभ प्रतिज्ञा
सानल माटि नइ मूरती सन
सभ प्रतिज्ञा मांगैत खून पसेना
समय आ निष्‍ठाक एकटा ठोस फांक
आ कखनो कखनो दू व्‍यक्तिक प्रतिज्ञा
दौड़ैत हिंसक मूद्रा मे
कखनो त' एके व्‍यक्ति क' दू प्रतिज्ञा
आमने -सामने
दूनू सँ जुड़ल कतेको दिन-राति
कथा कविता ............

मैथिलि--काव्य: Kavita--Maithili

मैथिलि--काव्य: Kavita--Maithili: भोरूकवा मे सुति उठल छलौं तखने छोटकुन बाजि उठल-- 'आब मैथिली रानी समर्थ भेली पाबि संविधान मे स्थान मैथिली रानी धन्य भेली | ' कोयल...

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हरि मोहन झा




हरि मोहन झा