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Thursday, 5 February 2015

चचरी

कविता केर चचरी मे गांथल सोनाक तार देखियौ
मुरदा मे साटल चिप्‍पी केर अलंकार देखियौ
नेनाक दुआदसा मे कर्मकाण्‍डक टीटकार देखियौ
संस्‍कृतिक सारा पर शुद्ध भाषाक परचार देखियौ

अ.मृ.त.घट.

सोनाक रोशनाई सँ लिखल अ.मृ.त.घट..
घैलक मुंह पर राखल चानीक सरबा
सरबा बान्‍हल हीराक तार सँ
दूरे सँ चमकैत अमृतघट
आडि़ भूगोलक समाजक तरपैत
छूबाक सौभाग्‍य अमृतघट
धिकभाग्‍य हमर
एको बूंद नइ अमृत.....
एको बूंद नइ
सोनाक अमृतघट मे एको बूंद जल नइ
एको बूंद नइ कि दू-चारियो टा कोशिका कें भेटैं जीवन-रस
सोनाक अमृतघट केवल टीटकार छैक
ई टीटकार बनल रहै ऐ वास्‍ते
तैयार पूरा नियम-विधान संविधान
वेवस्‍था आ व्‍याकरण
आ नियम तोड़ैवला लेल
खूब भड़कगर रंग मे लिखल रहै
ढ़ेर रास चेतावनी
रंग-रंगक लालच
रंगबिरही पुरस्‍कार.....

Tuesday, 27 January 2015

मैथिलीक छद्म हितचिंतक 1

ऊ अपना आपके मैथिलीक सबसँ बड़का सेवक मानैत छथिन ,मुदा दिमाग मे ई राखने छथिन कि मैथिली हुनकर मुट्ठी सँ बाहर नइ हो ।हुनकर आचरण शुद्धतावादी अछि ,ओ हरदम भाषाक बचेबाक जंजाल खड़ा करता ,जेना कि मैथिली भाषा भाषा नइ होइ परसाद होए आ दसलोक के लेलाक बाद एगारहम लेल बचबे नइ करतै ।ओ अठारहम शताब्‍दीक वर्णवादी सोइत बाभन छथिन ,जनिकर सब कर्मकाण्‍ड आ सब संस्‍कार केवल स्‍पर्शे धर्म तक ।जें कि कोनो अ‍परिचित शब्‍द देखता तें कि गारिक दमकल प्रारंभ क' देता ।ई दमकल कखनो हिंदी दिस ,कखनो भोजपुरी दिस आ कखनो नेपाली दिस गरजैत छैक ,अओ जी बाबू साहेब भाषा आ शब्‍द अनुभव सँ आबैत छैक नें कि शब्‍दकोष सँ ।जेकरा जे लिखबाक होए आ जेना लिखबाक होए लिख' दियौ ,यदि दू-च‍ारि टा विजातीय शब्‍द ,क्रिया ,विशेषण आबैत अछि तखन ओकरा गहूमक खेत मे चमकैत तोरी जेंका किएक ने देखि पाबैत छियैक ।कुनो भाषा केवल शुद्धतावादी कर्मकाण्‍ड सँ थोड़े चलैत छैेक ,यदि कर्मकाण्‍डे सँ भाखा चलतै ,तखन पालि,प्राकृत जनमबे ने करतै छल ,तें सरकार ! भाषाक प्रवाह कें मोड़बाक प्रयासो नइ करियौ ,बस एकटा सुधी प्रेक्षक जेंका प्रेक्षण करैत रहियौ ।आ भाषा आ साहित्‍यक यदि विस्‍तार हेतै तखन नया-नया शब्‍द ए‍बे करतै ,‍नइ विश्‍वास होए त' विद्यापति सँ पूछू कि ओ ज्‍योतिरीश्‍वर लिखित सब शब्‍द के देकसी मारि के उतारि लेलखिन कि अपना विवेक सँ शब्‍द पर छेनी-मरिया चलेलखिन ।

Friday, 9 January 2015

betik pukar

"बेटीक पुकार "

ठोहि पाइर क कहैया
बेटी एहि समाज सँ
जीबअ दिअ हमरा बाबू
हम नहि छि अभागिन यौ !!

जँ मौका देबई हमरो बाबू
हमहूँ बनबई डॉक्टर आ कलेक्टर
करब आहाँक नाम रौशन
जीबअ दिअ हमरा बाबू यौ !!

मानलौं बेटी धन छै पराया
छोइड़ चइल जाएत घर आहाँक
मुदा इ नियम समाज बनेलक
एहि मे हमर कोन दोष यौ !!
: गणेश कुमार झा "बावरा "

Friday, 2 January 2015

व्‍यंग्‍य

हास्‍य भेल एक चास आ व्‍यंग्‍य भेलै चारि चास ।हास्‍य भेल एहन खेत जइ मे या त' मकै होए वा गहूम वा धान आ व्‍यंग्‍य भेल एहन खेती जेकरा एक लाईन मे मकै आ दोसर मे आलू होए ,राहडि़क खेत मे हरदिक डांट ।हास्‍य थिकै वाण ,भाला ,कोदारि मुदा एके चीज या त' भाला या कोदारि ,व्‍यंग्‍यक भूमिका बहुआयामी ,ई कखनो कोदारि ,कखनो खुरपी ,कखनो हांसू आ कखनो नहकटनी बनि जाइत छैक ।हास्‍य बहुत ठोस बहुत मूर्त चीज छैक ,जेकरा छुअल जा सकैत छैक ,एकरा खाएल-पीयल जा सकैत छैक ,तें ई खतम भ्' जाइत छैेक ,एकटा अंतरालक बाद एकर अनुपस्थिति लक्षित कएल जा सकैत छैक ,व्‍यंग्‍य खतम नइ होइत छैक ,तें ध्‍वनिकार(आनंदवर्धन) युवतीक सौंदर्यक अवयव आ लावण्‍य कें अलग-अलग मानैत छथिन ,हुनका हिसाबें दीपशिखा आ ओइ सँ निकलैत प्रकाश राशि एके चीज नइ थिक-
आलोकार्थी यथा दीपशिखायां यत्‍नवान् जन: ।
तदुपायतया तद्वद् अर्थे वाच्‍ये तदादृत : ।।

Tuesday, 25 November 2014

अमरजी क' कविता आसिन

अमर जीक एकटा कविता ' आसिन' अपन अभिधात्‍मकता सँ भरपूर अछि ।जत्‍त्‍ो सूचना प्रथमद्रष्‍ट्या उपलब्‍ध छैक ,कवियो ओतबे कहैत छथिन ,कनियो बेशी नइ ,एहन स्थिति मे काव्‍यात्‍मकताक खोजबीन कएल जा सकैत छैक ।ऐ कविता मे ई स्‍थूलता बड्ड बेशी छैक ,जइ सूक्ष्‍मता क आवश्‍यकता कविता मे जरूरी होइत छैक ,से कत्‍त' छैक ईहो खोजब जरूरी ---------
आएल आसिन मास मनोरम
उमड़ल नव-नव-आस
अति मन्द मन्द बहि रहल पवन
पवनक गति पर
श्यामल श्यामल
मृदु शस्य राशि अछि झूमि रहल
झुकि-झुकि धरणिक पद चूमि रहल
से बूझि पड़ै जे
प्रकृति पहिरि चट हरित वसन,
लट पट, चंचल,
शंकित मन,
पंकिल पथ पर पद
बढ़ि रहल निरन्तर
क्रम पर क्रम चलि रहल
दुर तर प्रियतमृग,
मुख अरूणिम-प्रभ
उमड़ल अन्तरमे मधुर मधुर
आनन्दक पूर्वाभास
आएल आसिन मास मनोरम
उमड़ल नव नव आस।
जन
पुलकित मन
कै श्रद्धासँ पितरक तर्पण
पुनि भक्ति भावसँ नत शिर भ’
माताक चरण पर
कै अर्पण
किछु भाव सुमन
गद्गद् स्वरसँ अछि गाबि रहल
स्वर लहरी पर साकांक्ष श्रवण
उत्सुक लोचन
स्मृत पट पर अंकित
स्वर नर्तन
क्यौ
जय जय भैरवि असुर भयाउनि
गाबि गाबि
सुधि बिसरि अपन
दै ताल मधुर
किछु थिर कि थिर्राके
अछि नाचि रहल
प्रमुदित अग अग
शरदक निशि छवि
जगमग जगमग
पुलकित धरणी
विकसित शतदल
उल्लासित हृदय आकाश
आएल आसिन मास मनोरम
उमड़ल नव नव आस।

Sunday, 5 October 2014

Abhagal Janta

"अभागल जनता "
कोनो मोल नहि सधारण मनुषक जिनगीक
कीड़ा मकोड़ा जेना समा जाइत अछि
अकाल काल के गाल मे
बड़का बड़का कहाबे वाला जनसेवक
जनता के बुझैत अछि भेड़ बकड़ी
कटवा दैत अछि अपन कुर्सी खातिर
मृत्यु परल लाश पर सेहो होइत अछि राजनिती
खूब घोषणा होइत अछि क्षतिपूर्तिक हेतु
हर बेर बनैत अछि जाँच आयोग
मुदा परीणाम घास के तीन पात
लाशक मुआवजा मे सेहो घूसखोरी
ताहु पर साहबक सिनाजोड़ी
के किछु कहतै ओकरा
ओकरे शाशन ओकरे प्रशाशन
जनसाधारण बहाएत नोर
मुदा "अभागल जनताक" नोरक नहि कोनो मोल !!!!!!!!!!!
               
        :गणेश कुमार झा "बावरा "
          गुवाहाटी