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Wednesday, 21 December 2011

साहित्‍य अकादमी पुरस्‍कार 2010


साहित्‍य अकादमी पुरस्‍कार 2010
असमी कबीन फूकन
बांग्‍ला महेन्‍द्र गुप्‍ता
बोडो प्रेमानंद मोसाहारी
कश्‍मीरी नसीम सैफी
कोंकणी मेल्विन रॉड्रिग्‍स
संस्‍कृत हरेकृष्‍ण सत्‍पथी
संथाली आदित्‍य कुमार मांडी
उर्दू ख़लील मैमून
(उपरोक्‍त सब कवि छथि)
हिंदी काशीनाथ सिंह
कन्‍नड़ गोपालकृष्‍ण पई
मणिपुरी क्षेत्री बिरा
उडि़या कल्‍पनाकुमारी देवी
पंजाबी बल्‍देव सिंह
राजस्‍थानी अतुल कनक
तमिल एस वेंकटेशन
(सब उपन्‍यासकार)
डोगरी ललित मगोत्री
ग्रेस मराठी
तेलुगू सामला सदाशिव
(सब निबंधकार)
रामचंद्र गुहा (अंग्रेजी मे नैरेटिव हिस्‍ट्री)
मोहन परमार(गुजराती मे लघुकथा)
एम के सानु (मलयालम में जीवनी)
मोहन गहानी (सिंधी मे नाटक)
मैथिली मे बाद मे पुरस्‍कार देबाक घोषणा सँ विभिन्‍न संस्‍था ,मैथिली लेखक आ सुधी पाठकगण क्षुब्‍ध छथि ।की सबसँ नीक जँका चयन मैथिलीए मे हेतए वा मैथिली क लेल एहन पुस्‍तक सब छलए ,जाहि पर निर्णय जल्‍दी संभव नइ छैक ।की निर्णायकगण बीमार छलाह या छथि ।यदि कोनो पोथी पुरस्‍कार योग्‍य नइ छैक तखन सेहो बता देल जाए ।ऐ सब बातक उत्‍तर मैथिल समाज जान' चाहैत अछि ।यदि अकादमी अपन विश्‍वसनीयता बनाके राख' चाहैत अछि ,तखन ओकरा सविस्‍तार ऐ प्रश्‍नावली क जवाब देबाक चाही ।

Sunday, 18 December 2011

देश आ गेयर

देश सुस्‍ता रहल छइ
या पनहा रहल छइ
चाही एकरा तेल ग्रीस मोबिल
आ तहिना साहित्‍य आ सम्‍बन्‍धो मे
पहिले हमरा पढ़ैत देखि
मॉ आनइ छली चाय पानि
बाबू तमाकू चूनबैत
चलि जाइत छलाह अकाश सँ आगू
आ कनिया पहिरैत छली चूड़ी ,पायल नि:शब्‍द
झनझनाहट सँ भंग नइ हो हमर ध्‍यान
हवा बिहाडि़ सेहो बहैत छलए पूछि के ।
हमरे खोंखी सँ खोंखियाइ पूरा दुनिया
हमरे सपना सपनाइत उगैत छलइ चान सूरज ।
ओ आर जमाना छलए नेता जी
यादि अछि अहॉ क एक संकेत पर देश बिछ जाइत छलइ
अहॉ मतलब देश आ देश मतलब अहॉ नेताजी
आब दोसरे हवा बहि रहल
सब अपना विषय मे सोचि रहल
स्‍त्री ,सोलकन,जाम्बिया ,भूटान ,लातेहार ,पलामू
सबके पता छइ अपन हित अपन बात
देश ,सम्‍बन्‍ध ,साहित्‍य चढ़ाई पर चलि रहल
 चाही बेशी दम गेयर नम्‍बर चारि
बेशी गति बेशी तेल पानि
या फेर बच्‍चा क वीछियो जँका बढ़ा दियओ लेवेल
धूर्तता ,छल ,धोखाक लेवेल बढ़ब' पड़त
चाही नया नया मुखौटा
मोबिलाइजेशन प्रोपेगंडा
पाखंडक अद्यतन संस्‍करण
दोसरे हवा बहि रहल छैक
 देश दुनिया जागि रहल छइ

Friday, 16 December 2011

पॉंच केबी


Saturday, 10 December 2011

जन्‍मदिनक मधुर मंगलकामना टिल्‍लू जी

जन्‍मदिनक मधुर मंगलकामना टिल्‍लू जी ।बहुत दिन सँ अहॉं से बात नइ भ' रहल अछि आ हम प्रयासो केलहुं त' अहॉ व्‍यस्‍त रही ,कखनो टाटा ,कखनो भुवनेश्‍वर ।आइ अहॉक जन्‍मदिन अछि आ अहॉक सभ स्‍वप्‍न सभ प्रतिज्ञा सामने होयत ।भगवान सँ हमर सभक प्रार्थना कि अहॉंक सब कामना फलीभूत हो ।मैथिली भाषा क एकटा पाठक होयबाक नाते हमर ई कामना कि अहॉ सब तरहें मैथिली साहित्‍य के समृद्ध करी ।एकटा कविक पुत्र होयबा क नाते जे दायित्‍व अहॉ क छल से अहॉ लगभग पूरा क देलहुं ,मुदा एकटा लेखक होयबा क नाते अहॉके बहुत किछु करबा क अछि ,ने केवल मात्रा मे बल्कि गुणात्‍मकता मे सेहो ।
अहॉक कविता मे बूच भैया क कविता क छाया देखाइत अछि ,ई जत्‍ते स्‍वाभाविक छैक ,ओतबे अहॉ लेल अपरिहार्य अछि कि अहॉ अपन रस्‍ता बनाबी ।जे ओइ पीढ़ीक दुख छैक ,ई ओकरे छैक आ ओ पीढ़ी जे शिल्‍पक चयन केलकइ ,सेहो ओकरे रहतइ ,नवका पीढ़ी के बेशी नवोन्‍मेषी बनए पड़तए ,तखने ई ज्‍योतिरीश्‍वर आ विद्यापतिक भाषा अपन प्रासंगिकता बनेने रहतइ ।यद्यपि सभ भाषाक अपन अपन संस्‍कार होइत छैक आ ओकर रचनात्‍मकता सेहो इतिहासक कोखि सँ निकलि रहल छैक ,तैयो लोकल किछु नइ रहलइ ।

अहॉक आलोचना भाषा तथ्‍यात्‍मक आ निर्णयात्‍मक रहैत अछि ।तथ्‍यात्‍मकता यद्यपि प्रामाणिकताक अंग बनिके आबैत अछि ,तथापि कखनो कखनो ओ पाठ के बोझिल सेहो बनबैत अछि आ तथ्‍य क बोझ तखन आर बेशी भ' जाइत अछि ,जखन ओ केवल जानकारी क प्रदर्शनक लेल आबैत अछि ।जेना 'गामक जिनगी' पर लिखैत काल अहॉ खूब रास कहानीकारक नाम लिखैत छी । बात केवल अहींके नइ अछि ,प्राय: मैथिली मे नामक गोला चलैत छैक ,आ लेखकक भाषाक स्‍वभाव ,ओकर बनावट पर कम विचार होइत अछि ।तहिना तुलनात्‍मक आलोचनाक मतलब लेखक लोकनि दूटा किताब ,लेखक या उद्धरणांश सँ बूझैत छथिन्‍ह ,तुलनात्‍मक आलोचना के सही बाट देखयबाक जिम्‍मेवारी अहीं सन लेखक के अछि ।ऐतिहासिक आलोचना एखनो महत्‍वपूर्ण अछि ,किएक त' मैथिली साहित्‍यक इतिहास आ विभिन्‍न युग ,लेखक ,क्षेत्र आ प्रवृत्तिक कार्यभागक सही सही मानचित्र अखनो हमरा सभक समक्ष नइ अछि ।समाजशास्‍त्रीय आ उत्‍तर आधुनिक आलोचना क बाते छोड़ू ,एकर त' नामोनिशान अखन मैथिली मे नइ अछि ,मुदा अहॉ सन उद्योगी व्‍यक्ति हमरा समक्ष छथि ,तें आशान्वित छी ,आइ ने काल्हि सब चीज अनुकूल स्‍थान पर मानक रूप मे रहत ।
आइ बस एतबे ,जन्‍मदिनक फेर सॅ मंगलकामना ।अहॉ चिरायु हो ।

Thursday, 8 December 2011

मनोज भाय के चिट्ठी

की भाय आबो राजदूत उड़बै छियइ सौ पर
की भाय आबो हंसइ छियइ ओहिना हहा के
की भाय आबो देखइ छियइ रौद बरखा के ओहिना प्रेम सँ
की भाय आबो कचकूह आम देखि पानि आबैत अछि मुंह मे
अपन गाछी आ दोसरक आम एखनो नीक लागैत अछि
की भाय जालंधरो करियने जँका छैक
कोना साधए छियइ उदयनाचार्य आ जालंधरनाथ के एक साथ
नव्‍यन्‍याय आ नाथपंथक सूत्र कत' मिलैत अछि
या हमरे जँका उलझैत देरी छोडि़छाडि़ निवृत्‍त भ' जाइ छी
सही कहलहुँ भाइ
विदेहो त' हमरे छथि
आ हम पूरा दुनिया मे पसरलाक बादो ओतबे लोकल छी
सक्‍कत माटि खींचैत अछि हमरा
आ दरिद्रछिम्‍मरि रहितहुं ओतबे सामंतवादी छी
संग मे अछिए की ,जे दुनिया छीनत
तैयो पकड़ने छी अपन दूबि के बकुट्टा मे
छोड़ू ई सब
 की  ओतहु एहिना गामघर गीतनाद धूपदीप
यादि आबै छी हम ,गाम आ समाजक लोक
बड़ी ,‍सिंगराही ,नबकी  नौला पोखरि
बडि़याही ,बलहा घाट
ककरहा ,ठकुरनीया ,महिसर बाध
कखनो सुनइ छी प्राती ,नचारी ,समदओन
चाखै छी नबका चूड़ा पर छलियैल पूष मासक टटका दही
हंसए क बात पर हंसइ छी
आ कानइ क मौका पर
गिरैत अछि नोर
या आहूं के मारि देलक समय
जेना हमरा मारलक सम्‍हरल डांग सँ

Monday, 5 December 2011

बियाह आ मोंछ

ओ बियाह नइ ,मोंछक लड़ाई छलई
आ सभक अपन अपन प्‍लान रहए
बाबू ,मॉ ,दोस ,सासु ससुर
संस्‍कार कम ,नाच बजार छलइ ।
 बाबूए पढ़ेने लिखेने रहथिन
तें बियाह हुनके पसिन्‍नक जगह ,लड़की आ तिथि के निश्चित छलए
भैयाक लेल ई छलए अचूक मौका
साबित करबाक लेल बहुत रास चीज
तें केवल नवका चमचम गाड़ी क जखीरा रहए
आ यदि ऐ साल बियाह नइ हेतइ
तखन बाबू क मोंछ आ माथ नीचा भ' जेतेन ।
यदि हम काजर लगेबा सँ रोकबा क प्रयास करतियइ
तखन जनानी सबक नजरि मे
मॉ बहुत छोट भ' जेतइ
आ ससुर महराज सेहो लगेने रहथिन बाजी ककरो सँ
तें दिसम्‍बर पक्‍का रहए
आ ने हमर उमेर कम रहए
ने हम बेरोजगार रहियइ
तें ससुरक ससुर जांच करबा लेल पहुंच गेलखिन
बागमती सँ केन
कहीं कोनो जनानाक चक्‍कर त' नइ छइ
आ बियाह मे जरूरी रहए दारू पीनए आ नाचनए
किएक त' वीडियो गड़बड़ा जेतइ
आ धियान देने रहए बहुत लोक गिद्धो सँ बेशी
हम हुसियइ
आ ओ प्रारम्‍भ करए ।

Thursday, 1 December 2011

प्‍लेटो आ हमर कनिया

अंतत:
प्‍लेटो के योग्‍य शिष्‍या मिलिये गेलेन
हे मैथिलीक स्‍वर्गीय कविगण
बता देबेन प्‍लेटा के
ओ एकटा युवा महिला छथिन्‍ह
आ जहिना प्‍लेटो दोड़ैत छलथिन्‍ह
कविता दिसि राजदंड ल के
तहिना ललकारैत छथिन्‍ह ई
एकटा नवोदित कवि के
आ पूछैत छथिन्‍ह एकटा अस्‍थापित कवि सँ
की हेतओ ऐ कविता ल' के
 काज रोजगारि छोडि़
किएक बताह भेल छें
सजमनि छीलैत आटा सानैत
फोड़न दैत छौंकक मेंजन तैयार करैत
बच्‍चा के मुंह मे कौर दैत
नेटा कांची पोछैत
नाना प्रकारक मुखाकृति
भाव भंगिमा
खुसुर फुसुर
खौंझाइत बड़बड़ाइत
गारि गीत जँका
कखनो गायत्री मंत्र
कखनो सप्‍तशती
कखनो कोनो अतुकांत वैदिक ऋचा
अरबीक अबूझ नेमाज जँका ।
आ प्‍लेटा जे नइ क' सकला मंत्री पद अछैत बधाई प्‍लेटो ।
अहॉक योग्‍य शिष्‍य अरस्‍तू वा
हमर कनियां
। ओ निर्णय निकालि नेने छथि
एहिना फिफियाइत रहब
हिहियाइत रहब किछु देखने सुनने
ऐ दुनिया मे सब केओ अछि आ
दुनिया ढ़न्‍नूक लाल सॅ नइ चलैत अछि
मुदा ई दुनिया ढ़न्‍नुको लालक छैक ।